नाम; डॉ गुरिंदर गिल
लाहड दातु, साबाह,
मलेशिया। { अभी इन दिल्ली }
शीर्षक- आक्रोश
आक्रोशित सिर्फ इंसान ही नहीं होता
धरती और सागर भी करते ये काम है
तूफ़ान जलजला चक्रवात बंदरगाही लहर
सुनामी इस आक्रोश का ही परिणाम है
अभिव्यक्त आक्रोश है मौन आक्रोश है
आक्रोश ग़मज़दा होने का ही इनाम है
कोई मन मसोसता है बेबसी को कोस्ता है
आक्रोश की कील ठोकने का करता काम है
आक्रोश मन मष्तिक में भरी चिंगारी है
जला दुनिया सारी फिर लेती इन्तेक़ाम है
नारी पर जब आंच आये तो चंडी बन जाये
बन झाँसी की रानी करे सबका काम तमाम
जीयो और जीने दो का अब बंद करो सन्देश
मर कर नहीं मारने से ही होगा पूरा इन्तेक़ाम
मेरी कलम स्याही नहीं खून से है लिख रही
मार दुश्मनों को शहीदों के बदले का पूरा करो काम
सरवरचित
डॉ गुरिंदर गिल
दिल्ली - 56
No comments:
Post a Comment