स्थान-----नवापाराखुर्द/सक्ती
जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा- कविता (उल्लेख अलंकार पर आधारित )
शीर्षक --जीवन का पड़ाव
व्याख्या ---कवि द्वारा जीवन में आने वाले पड़ाव मुख्य रूप से बचपन युवा वस्था वृद्धा वस्था उसमें सीखने एवं बिताने का वर्णन किया गया है ।
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जीवन का पड़ाव
ए जीवन का पड़ाव तू समाया है ,बचपन में, युवा पन में, वृद्ध पन में ।
तूझसे मैंने सीखा है हर पल ,मां के गोद में खेलते हुए हंसते हुए रोदन में ।
तू न होता सीख न पाता ,सुख को दुख को आते जाते छाया और धूप को ।
धूल देखा मिट्टी देखा पत्थर देखा, उसमें खेला जाना सारी धरती गगन को ।
कभी रात के अंधेरे दिन के उजाले ,उगते सूरज सुबह दोपहर शाम ढ़लते देखा ।
हुई रात निकली चांद और चांदनी ,जुगनू तारे बादलों में छुपते और निकलते देखा ।
पता नहीं चला कब गया बचपन, आई जवानी और जिम्मेदारियां भी बढ़ गई ।
पत्नी मिली बच्चे मिले घर था ,ससुराल मिला आना जाना एक राह नई निकल गई ।
व्यस्त हुए मस्त हुए कुछ कार्यों में, सिद्धहस्त हुए एक नया पहचान मिला ।
धन कमाये जन कमाये एक से एक, मन कमाये कुछ रुष्ट हुए कुछ आशीष मन से निकला ।
।
धीरे धीरे वह भी अब आने को है ,जिसे वृद्धा वस्था कहते हैं ।
तन मन से अलग जहां सुना हूं होते हैं ,और भले साथ रहते हैं ।
पूरे जीवन के यादों का एक आते, एक जाते कुछ पिटारा साथ रहता ।
सोचकर मन गदगद होता कभी ,पछतावे से आंसू हैं बहता ।
गिरधारी लाल चौहान
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