जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा-छंद मुक्त
शीर्षक- *रक्षाबंधन*
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मन की व्यथा को कोई प्यार लिख रहा हूॅं,
मुरझाए फूलों से फूलों का हार लिख रहा हूॅं ।
पहले सजी थी जो कलाई,
सूनी कलाई से राखी का त्योहार लिख रहा हूॅं ।।
है गुजारिश कि किसी की न सूनी कलाई हो,
दुखों से लड़ने हर बहन की कोई भाई हो ।
पावन है यह सदा पुनीत पावन रहे,
प्रतीक प्रेम का राखी ही ईष्ट इकाई हो ।।
जिस आंगन में बेटी की किलकारी नहीं,
घर है सूना जहॉं भाई-बहन की लड़ाई नहीं ।
दुखी देख जो द्रवित न हो,
फिर नवयुवक तरुणों की तरुणाई नहीं ।।
रोली कुमकुम मेहंदी संग अखण्ड सुहाग रहे,
कच्चे धागे के रिश्ते में शेष प्रेम का राग रहे ।
माना हवाएं ईमान हिला देती हैं,
पर हों कैसे भी तूफॉं जलता हुआ चराग रहे ।।
हाथ सूनी है पर कच्चे धागे की कसक बाकी है,
आंखों में आंखें डाल आलिंगन की कसक बाकी है ।
तुझे देख यादों की तिजोरी खुलने लगी है,
इन्हीं यादों में कुछ टटोलने की कसक बाकी है ।।
जहाॅं होगी भ्रूण हत्या हम रक्षा का वचन निभाएंगे,
शिक्षा-संस्कृति को बचाने पहला कदम बढ़ाएंगे ।
बस याद करना आंसुओं को रोके रखना,
देखना जलती शोलों पर भी दौड़ आएंगे ।।
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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
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