जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
शीर्षक - " अधूरी ख़्वाहिशें "
विधा - छंदमुक्त कविता
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मेरी भी एक गुज़ारिश है।
मेरी भी एक फ़रमाइश है।
आसमान की बुलंदियों को छू लूँ,
मेरी भी एक ख्वाहिश है।।
पाठशाला मैं भी जाऊँ,
मेरी भी एक तमन्ना है।
पढ़ लिखकर मुझे भी तो,
अपने सपने पूरे करना है।।
मंज़िल मिलेगी मुझे भी,
या सिर्फ एक आजमाइश है।
आसमान की बुलंदियों को छू लूँ,
मेरी भी एक ख्वाहिश है।।
पीठ पर मेरे भी बोझ बहुत,
खत्म ख्वाब, भूख में अनाहूत।
मुक्कवल कैसे होंगे ख्वाब मेरे,
हकीकत होने की कितनी गुंजाइश है।।
आसमान की बुलंदियों को छू लूँ,
मेरी भी एक ख्वाहिश है।।
सारी ख़्वाहिशें अधूरी हो गई,
सपने मेरे सब चूर हो गये।
जितना पास आता गया,
हकीकत उतना दूर होते गये।।
ख्वाबों की दुनिया मैंने भी एक सजाया था।
चुनिंदा-चुनिंदा फूल से सुंदर माला मैंने बनाया था।
अधूरी ख्वाहिश अधूरे ओ माला हो गये।
जिंदगी सिर्फ हालातों का जाला हो गये।।
सोचा था आसमान में घर बसाऊँगा,
तारों से अपने जीवन को सजाऊंँगा,
अधूरा मेरा ओ गीत हो गये।
रूदन भरी संगीत हो गये।।
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Very nice very deep
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