रायगढ़, छत्तीसगढ़
विधा-छंद मुक्त कविता
विषय-अधूरी ख्वाहिशें
जीवन के इस सफर में
कई मंजिले छूट जाती हैं
अक्सर ये होता है
कुछ ख्वाहिशें अधूरी ही टूट जाती हैं
पर इस अधूरेपन का रंज
जीवन भर साथ निभाता है
फुरसत के पलों में जाग जाता है
और हमे सोने नही देता है
वक्त के थपेड़ों से ख़्वाहिशों को
बचाने की बहुत कोशिशे की
पर किस्मत ने हर बार छला
और ख्वाहिशे पूरी ना हो सकी
चाँद-तारो को छूने की चाहत
नही थी कभी ,बस चंद
कदम ही और साथ चल लेते
तो ख़्वाहिशों की मंजिल पा लेते
हमारे और ख़्वाहिशों के मध्य
बस जरा सा फासला था
गर थाम तुम्हारे हाथों को तय कर लेते
तो ख्वाहिशें यूँ अधूरी ना होते।
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