Tuesday, August 25, 2020

जांजगीर-चांपा से गिरधारी लाल चौहान की रचना- ईश्वराधीन

नाम----गिरधारी लाल चौहान
जिला----जांजगीर -चाम्पा,छत्तीसगढ़
विधा- कविता(दीपक अलंकार , दर्शन पर आधारित )
शीर्षक --सब ईश्वराधीन
व्याख्या ---कवि के द्वारा  जगत की सारी को ईश्वर के अधीन बताया एवं उनके प्रभाव मानव के प्राप्त करने एवं फलों का वर्णन किया गया है ।
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सब ईश्वराधीन

सारा जग ईश्वर के अधीन,सूरज चांद रात दिन ।
सीधा साधा सरल बहुत, दुर्लभ दुर्गम महा कठिन ।

सबका एक ही लक्ष्य, धर्म ,अर्थ, काम और मोक्ष ।
निर्जीव ,सजीव सभी का ध्यान,देख रहे पथ नवीन ।

परीक्षा सब दे रहे, सफलता- विफलता उनके कर ।
परिणाम तो आयेगा ही,छुटे नजर या झुके कमर ।

देख पेड़ सोच रहे,डाल ,पात ,पुष्प और लगे फल ।
नर करे उपयोग इसका, हो सके आज हो या कल ।

ईश्वर से विमुख चलाये,काया ,माया  कमाया धन ।
दीवार और बाधाएं खड़ी करें,  कभी अपना ही जन ।

साथ लगे,पत्नी ,बन्धु ,परिवार,सखा ,दास ,याचक ।
अन्त समय छूटते, जैसे गिरे परदा चलते नाटक ।

रंग श्वेत, श्याम ,अरुण, सबको एक न रंग सके ।
आन बान शान सबके , सबको एक न कह सके ।

ज्ञान ,ध्यान, आस्था, विश्वास लेकर सब चले ।
उसको खबर  मिले,तेल बाती बिन दीप जले ।

तन मन जीवन है बना,जो बनाया वो जाने ।
उसकी सूत्र जन्म फिर जन्म,जग यह बखाने ।

गुण- दोष, पाप -पुण्य, धर्म -अधर्म मानव की गणित ।
इसमें बांध रहा मानव को सीमित और असीमित ।

गिरधारी लाल चौहान

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