जिला - बलौदा बाजार ( छ. ग. )
विषय - दर्शनशास्त्र
विधा - कविता ( दीपक अलंकार )
शीर्षक - आत्म दर्शन
चूड़ी कंगन हार अंगूठी ,
सबमें सत्ता सोने की ।
ऐसे ही प्रभु की सत्ता है ,
जड़ - चेतन में होने की ।।
तरंग बुलबुला झाग बर्फ में ,
ज्यों केवल पानी ही पानी ।
त्यों सृष्टि की हर घटना मे ,
छिपी हुई ईश्वर की कहानी ।।
अखिल विश्व है ब्रम्हस्वरूप ,
नाम रूप रंग भले अलग ।
जैसे अनेक मटका-ईंटों में ,
मृदा मात्र की ही चमक ।।
टी.वी. पंखा कूलर फ्रिज मे ,
बिजली की सत्ता चलती ।
रोम-रोम घट-घट में भी ,
ऐसे ही आत्मा बसती ।।
शुद्ध ठोस निज आत्मतत्व की ,
सर्वत्र समान फैलाव ।
आत्मा ही परमात्मा है ,
एक ही ब्रम्ह स्वभाव ।।
सुख-दुःख हानि-लाभ सकल ,
सर्दी-गर्मी जय-पराजय ।
गौ हाथी कुत्ता नर में भी ,
समदृष्टि का सर्वोदय ।।
गीता का यह समत्व योग है ,
हिन्दू वेदान्तिक दर्शन ।
'अहं ब्रम्हास्मि' का उदघोष ,
'वसुधैव कुटुम्बकम्' का चिन्तन ।।
यह जग जीवन सपना है ,
क्षणभंगुर और मिथ्या ।
आत्मनिष्ठ व्यवहार करो ,
पा लो अपने प्रभु पिया ।।
---#---#---#---
No comments:
Post a Comment