Saturday, August 8, 2020

रायगढ़ से उर्मिला सिदार की रचना- जीवन की दोपहर

रचनाकार-उर्मिला सिदार
ग्राम-बुलाँकी
जिला -रायगढ़( छत्तीसगढ़)
 विधा -कविता 
शीर्षक -"जीवन की दोपहर"


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       जीवन की दोपहर 

 जीवन की दोपहर में,
 मानव आ खड़ा है द्वार।
 समस्या से मुक्ति नहीं,
 कैसा होगा उद्धार।

 दुनिया को मनोरंजन बना,
 कर रहा है भोग विलास।
 पर्यावरण प्रदूषित हो गई,
 कैसा होगा बेड़ा पार।

 वक्रोक्ति की प्रचलन में,
 विनोद से मिलता आनंद। 
 कभी वक्रोक्ति लग जाए तो,
 हृदय  चुभे  आर -पार।

 अली कहती अरि! ओअली, 
 लाई हूँ कनक तेरी द्वार। 
 जितना लेना है तू ले ले,
 न  मिलही  बारंबार।

अरि!  ओ  सखी सुन जरा,
नहीं लेना है तेरा कनक।     
दोपहरी जिंदगी आ गई,
 संभालना है घर द्वार।

 कर जोरी विनती करूंँ, 
 सुन री सखी मेरी बात।
 तेरी भलाई के लिए आई थी,
 दूर दराज  से तेरे द्वार।

 कर जोरी क्यों विनती करती हो,
 कर से मैं खुद हूंँ परेशान ।
 इस समस्या से कब मुक्त मिले, 
 न आना अली मेरे घर द्वार।

 लग गई अली को वक्रोक्ति,
 पर्दा झांके ना द्वार।
 कृतज्ञता भाव टूट गई,
 जा रही गेह से  मन मार। 

 यही है जीवन की दोपहरी,
 समझ सके ना कोय। 
 झेलते जिंदगी जीता मनु,
 समस्या जन-जन बोय। 

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 व्याख्या:- इस कविता में कवित्री जीवन की दोपहर को समस्या में जीते हुए बताया गया है और वक्रोक्ति टेढ़ी कथन विनोद जैसे लगता है लेकिन कभी-कभी नासमझी के कारण चूभ भी जाता है। अर्थात मजाक कभी-कभी लग भी जाता है। मन कुंठित हो जाता है। यह स्थिति अर्थ न समझने वालों की होती है।
 काव्य में विनोद के लिए ही वक्रोक्ति अलंकार का विशेषकर प्रयोग किया जाता है।
 इस कविता में कनक और कर शब्द आया है इसका अर्थ है कनक का अर्थ गेहूं से लिया गया है। दूसरी सखी इसे  सोना समझ लेती है। इसीलिए लेने के लिए मना कर  देती है क्योंकि अब
 उसे आडंबर जिंदगी ना जीते हुए मितव्ययिता से घर गृहस्ती चलाना है। पहली सखी उसके भलाई के लिए गेहूं लाई थी। दोनों एक दूसरे के अर्थ को नहीं समझ पाते हैं इसलिए सखी का मन टूट जाता है। और कर  शब्द आया है। एक का अर्थ है हाथ  दूसरा अर्थ है कार्य । हाथ जोड़कर विनती करती है उसी कार्य समझ लेती हैं। इन दोनों वाक्यो में वक्रोक्ति अलंकार का प्रयास किया गया है। प्रयास कर रहे हैं गलतियां हो सकती है।

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 उर्मिला सिदार रायगढ़ छत्तीसगढ़

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