कवि-शंकर गोयल
पिथौरा, महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक-अभी भी समय हैं
अभी भी समय है
क्या तुम
नहीं चाहते थे-
फूल खिले,
और गूंजे,
भौरों की गूँजन
तितलियां उड़े ?
नहीं चाहते थे तुम -
शरद आकाश ,
बसंत की हवा,
अमराइयों का उत्सव,
कोयल की कुहू,
हिरणों की कुलांचें?
तुम्हें तो पसंद थे भेड़िए,
भेड़िए- से- धीरे-धीरे
जंगली आदमी,
समूची हरियाली
निकल गए,
बना दिया सबको
अंधा- बहरा,
अभी भी समय है।
-------------------
No comments:
Post a Comment