रचनाकार- नलिनी बाजपेयी
संबलपुर, जिला-कांकेर
विषय-ख्वाब
दिनाँक-21.07.20
*ख्वाब*
ख्वाब अधूरे है,मगर है सुहाने,
पल-पल अरमान जगते है पुराने।
नदियाँ बहे अगम,पर्वत रोके अदम्य,
मैं ना रुकूँगी,ना थकूंगी,अधूरे ख्वाब पूरी करूंगी जरूर।
तन मेरा थका, मन मेरा थका है,
नम आँखों में है चिर वीरानी,
अधूरे ख्वाब में फिर रंग भरूँगी जरूर।
प्रस्तर चट्टानें हो,मरू भरे मैदान,
सागर की गहराइयों से नभ की ऊंचाइयों तक नाता जोड़ूंगी,
अधूरे ख्वाब से मैं जुडूंगी जरूर।
दम नहीं मेरे जज्बातों से कोई खेले,
तूफानों में भी दम नहीं करे मुझसे झमेले,
देर भले हो,अंधेर नहीं ख्वाब पूरे करूंगी जरूर।
मुझमें धैर्य है,साहस है,लक्ष्य छुपा मुस्कानों में,
ख्वाब अधूरे है सही उम्मीद के,
फूल लहराएंगे खलिहानों में गाथा लिखूंगी जरूर।
ऐतिहासिक ख्वाब अधूरे मैं पूरे करूँगी जरूर।
ख्वाब अधूरे है मगर है सुहाने,
पल-पल अरमान जगते है पुराने।
*व्याख्या*उपरोक्त कविता में अधूरे ख्वाबों को पूरा करने के लिए हर विपदाओं को पर लेना चाहता है।धैर्य और साहस के साथ ख्वाब पूरा करना चाहता है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर, (छ. ग.)
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