कवयित्री-कु.गरिमा पोयाम
स्थान:कांकेर(छ.ग.)
विषय:आखिर क्यों आते हैं सपने?
विधा:छंद मुक्त कविता
आखिर क्यों आते हैं सपने?
और हो जाते हैं अपने।
पता नहीं कब क्या दिखा जाते
हैं ये सपने,
कभी आसमान की सैर
तो कभी भूतों से मिलाते हैं ये
सपने।
कभी जंगल तो कभी सांप से डराते हैं ये सपने,
कभी हवेली तो कभी खंडहरों में घुमाते हैं ये सपने।
मैंने सोचा हमारे विचार ही
इनको बुलाते हैं,
पर ये तो बिन बुलाये
मेहमान की तरह आते हैं।
लोग कहते हैं मनुष्य दिन में काम कर रात को आराम करते हैं,
पर ये सपने तो मनुष्य को रात में भी काम कराते हैं।
कभी भूत तो कभी भविष्य
दिखलाते हैं ये सपने,
कभी चिड़ियाघरों तो कभी
पहाड़ों में चढ़ाते हैं ये सपने।
सपनों में ही हम अपनी अलग दुनिया बना लेते हैं,
सपनों ही सपनों में स्वयं को भुला लेते हैं।
सोते ही नींद में बना लेते हैं
इनको अपने,
सुबह होते ही कहते हैं
आखिर क्यों आते हैं सपने?
-कु.गरिमा पोयाम
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