नाम-अनुरमा शुक्ला
स्थान-दुर्ग(छ.ग)
विधा-छंदमुक्त कविता
शीर्षक-स्वप्न
२१-७-२०२०
*स्वप्न*
वह संध्या की सुहानी बेला,
पवन की मंद मंद बयार,
चेहरे पर हिम के मानिंद सुरसुरी फुहार,
हिंडोले मे झूल रही मैं हौले हौले,
बादलों को तक रही अनिमेष पलकें खोले,
निद्रा ने पलकों की कुंडी खटखटाई,
उड़ चला मन स्वप्न नगरी, संग लिये पुरवाई,
अंतरिक्ष उज्ज्वल दूधिया सी थी चाँदनी,
टिमटिमाते सितारों की आभा अद्वितीय थी।
झूमने लगी संगीत की लहरियों में,
आनंदित हृदय पुलकने लगा मन
पग पैजनी बाँधे नृत्य करने लगा तन,
थिरकते पैंरों से छूने लगी मैं गगन ।
सहसा फिसलन से तंद्रा जो टूटी,
रवि रश्मियों ने पलकों को छू ली ।
खुले चक्षु तो दिखे तारे जमीन के,
सहमें से चेहरे,आँखे उनिंदे से,
ममता के आँचल मे दुबके थे सारे,
फटे वसन,छाले पड़े थे पांवो में,
भूख की तड़प से बेचैन माँ के प्यारे ।
घास के बिछौने मे सोते हैं सारे
अंबर की चादर ओढ़े राज दुलारे,
इन मासूम नन्हे तारों के दुख कौन तारे
मौत है सर पर, हैं सब बेसहारे,
जीने की जंग लड़ रहे ये किस्मत के मारे ।
अनुरमा शुक्ला
Amazing
ReplyDelete❤️❤️💔
ReplyDeleteAunty kr jaise pyare pyare poem.... Adorable as always ❤❤❤❤❤❤love you my lioness 😊😊😊
ReplyDeleteBeautiful
ReplyDeleteBest
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