Friday, July 3, 2020

कांकेर से गरिमा पोयाम कृत लेख:- शिक्षा :वर्तमान परिदृश्य

लेखिका-कु.गरिमा पोयाम
           कांकेर(छ.ग.)
विधा-आलेख
शीर्षक-"शिक्षा:वर्तमान परिदृश्य"
               पहली महत्वपूर्ण बात मैं इस आलेख के माध्यम से यह कहना चाहूँगी कि हम शिक्षक जितना ध्यान पाठ्यक्रम और पुस्तक को समझने में देते हैं,उतना ही हमें बच्चों पर ध्यान देने की जरूरत है।हर बच्चा हमारे द्वारा पढाई गई बात नहीं समझ पाता क्योंकि हम अपने स्तर से पढ़ाने की कोशिश करते हैं जबकि हमें हर बच्चे की पढ़ाई के स्तर को समझ कर पढ़ना चाहिए।
           दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि हर बच्चे रचनात्मक होते हैं। उनकी रुचि किसी न किसी क्षेत्र में होती है,हमें जरूरत है कि हम उनकी रुचि पहचाने और प्रोत्साहित करें।प्रसिद्ध और महान शिक्षा शास्त्री गिजुभाई बधेका जी ने कहा है कि जब एक बच्चा आटे की लोई से खेलते हुए मुर्गा बनाता है और माँ उसे डाँट देती है तो उसके अंदर के मूर्तिकार को मार देती है।कहने का तात्पर्य है,हमें बच्चों की रुचि में उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए।क्योंकि कोई भी इंसान अचानक चित्रकार,मूर्तिकार,गायक,नृतक या कोई अन्य कलाकार नहीं बनता।
       तीसरी महत्वपूर्ण बात आज कई निजी विद्यालयों में नैतिक शिक्षा एक विषय के रूप में पढ़ाया जाता है और सरकारी विद्यालयों में भी पढ़ाया जाना चाहिए,क्योंकि अगर बचपन में ही बच्चों में नैतिक मूल्य विकसित किये जाएं तो बड़े होकर उनके बिगड़ने की संभावना कम रहेगी।
             एक शिक्षिका होने के नाते मुझे ये तीन परिवर्तन आवश्यक लगते हैं शिक्षा के वर्तमान के परिदृश्य में।
       -कु.गरिमा पोयाम
        कांकेर(छत्तीसगढ़)

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