Saturday, July 4, 2020

रायपुर से एच-एस-अरमो की रचना- मिटा ना सकोगे

रचनाकार-एच-एस-अरमो "अरमान "
निवास-रायपुर छत्तीसगढ़ ।
जिला--रायपुर ।
शीर्षक--""मुझे मिटा न सकोगे- - -""
विधा-छ्न्द-मुक्त ।
!!!!!!!!!@!!!!!!!!   !!!@@!!!!!!  !!!!!!
   ***मुझे मिटा न सकोगे--****
       """"""""" *****""""""""
नारी,अब,अबला  नहीं,
ज्ञान की,शान की, मान,
सबलता,पा ली है,आज ---?
  ये प्रतिशोध नहीं, सजगता है--
  मैं ही " बहु "मैं ही हूँ  " बेटी "
  मैं ही बनूँगी " सास " कभी--।

अब न जला पाओगे, मुझे---  ?
मैं ही, घर की शोभा---
मैं ही हूँ,कुल की  शोभा---
मुझ बिन,नर -जीवन,है अधूरा---
फिर मुझसे,ऐसी, नफरतें  क्यों--?

इसलिए,कहती हूँ मैं, आपसे---
मुझे मिटा न सकोगे---
जमाने वालों,मुझमें भी, शक्ति है--
तुम्हें मिटाने की,कुछ कर गुजरने की ।

मैं ही नहीं रहूँगी,
इस जगत में,तो,
तुम्हारी उत्पति, कहाँ हो पायेगी--।

इसलिए,समाज से,बुलंद आवाज़ में,
कहती हूँ -----
अब न जला पाओगे मुझे,
कभी भी----
वरना, तुम्हारे बेटे,
कुँवारे ही, इस सँसार में रह जायेंगे--।

अब ये,सँसार-चक्र का,
गतिक्रम- -जैसा तुम सोचते हो,
वैसा कभी,नहीं हो पायेगा,
इसलिए,बेटी की पैदाइश पर,
ढेरों खुशियाँ मनाओ,मंगल-गीत गाओ।

बेटी को योग्य और शिक्षित बनाओ ,
नालायक बेटों से, तो--
अच्छी-खासी सोच---
योग्य बेटियों की होती है,
तभी तो--ये--
मायके और ससुराल रुपी--
पहिए की,सशक्त धुरी होती है ।

बेटों को ,कुलदीपक मानने वालों,
जरा इतना,तुम जान लो आज,
विलासिता के नाम से,
डुबा दिये,कुल-वंश का नाम आज ।

यदि आज,वक़्त रहते--
समाज,इस गहराई को भली-भांति,
समझ लेगा तो---
कभी न ,"बेटी-बहु " बन जल न पायेंगी,
और होते रहेगा,दलन ,
दहेज-रुपी दानव का ।

क्योंकि--
बेटी--बहु-सा ,ज्योतिर्मयी-प्रकाश रुपी
सृजन की,अमृतधारा अविरल बहेगी,
और समाज में,"दहेज़ "की,
कभी ,भूल से भी,
बात न उठेगी,
बेटे व बेटी,बहु का भेद,
जगत से,यूहीं मिट जायेगी ।

=======इति ======
व्याख्या-- उपरोक्त रचना में यह कहना चाहता हूँ कि बहु,बेटी और बेटे की अहमियत को तुम जानो समाज वालों ।साथ ही इस समाज में फैले अन्धविश्वासों को मिटाने का एक छोटासा प्रयास मात्र है ।
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**मौलिक प्रस्तुति:---
*एच-एस-अरमो,रायपुर,छत्तीसगढ़ ।

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