Tuesday, July 14, 2020

रायगढ़ से उर्मिला सिदार कृत संस्मरण- मेहनत की खुशी

रचनाकार--  उर्मिला सिदार
ग्राम - बुलाकी
जिला-  रायगढ़ छत्तीसगढ़
विधा - संस्मरण
शीर्षक - "मेहनत की खुशी"
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जब कोई भी व्यक्ति पहली बार दूसरों से प्रेरित होकर , खुशी से मेहनत करता है, तो उस मेहनत का एहसास अलग ही होता है ।यह घटना 3 जून 2020 का है मैं हल्दी लगवाने बाड़ी जा रही थी ।मेरी 11 साल की पोती जो कक्षा पांचवी में पढ़ रही है। मुझे सामान पकड़ते पूछ बैठी ।दादी जी आप कहां जा रहे हो। मैं बोली बेटा मैं हल्दी लगवाने जा रही हूं ।पोती बोली मैं भी जाऊंगी।  दादी बोली बेटा जी बहुत धूप है , धूप में जाओगी तो आपकी मम्मी डांटेगी।  आप मत जाओ। वह नहीं मानी चप्पल पहन, मेरे से आगे हो गई ।जब दादी पोती बाड़ी पहुंचे, पहले से मजदूर सहयोगी काम में लगे थे। कोई खाद दे रहे थे, तो कोई हल्दी जगा रहे थे, तो कोई हल्दी में मिट्टी डाल रहे थे। स्नेहा गौर से सभी के कार्य मेड़ में खड़े खड़े देख रही थी ।मैं भी हल्दी को छांट कर अलग कर रही थी। सब के सब कार्य में लगे थे ।स्नेहा पता नहीं उसके मन में क्या भाव आया वह चाहकते हुए मेरे पास गई बोली ,दादी मैं भी काम करूंगी। मैं बोली बेटा आप काम कर पाओगे। स्नेहा बोली सभी तो कर रहे हैं मैं भी करूंगी। दादी से जिद करने लगी तब मैं काम करने की अनुमति दी। वह एकदम खुश हो गई और कभी खाद देने लगी, तो कभी हल्दी लगाने लगी, कभी मजदूरों को पानी देने लगी। तेज धूप था उसका चेहरा धूप में लाल हो जा रहा था मैं उसे घर जाने के लिए बोली। वह नहीं मानती थी और अपने  से खुश होकर काम कर रही थी। मैं पुनः बोली देख तो बेटा जी आप एकदम लाल हो गए हो। आपका मुंह देखते ही बनता है ,तेरी मम्मी देखेगी आपका हुलिया तो डटेगी। नहीं मानी उसका अंतर्मन बहुत खुश था ।तेज धूप के कारण उसका चेहरा लाल हो जा रहा था मन में खुशी और चेहरा धूप के कारण लाल होकर पसीना पसीना दिख रहा था ।लेकिन उसके मन में खुश हो कर काम करने की तीव्र इच्छा थी ।वह जब तक काम चल रहा था ।तब तक वह हमारे साथ़ थी। सब कोई आए तभी वह हमारे साथ आई ।आते वक्त रास्ते में पूछी दादी यह सब हल्दी क्यों जगा रहे हो ।मैंने उन्हें पूरे हल्दी के बारे में बताई ।हल्दी की उपयोगिता के बारे में भी बताई ,वह खुश हो गई ।दादी ऐसे ही और सब्जी उग आएंगे तो मैं भी आपके साथ काम करूंगी बोली। बड़ी होकर मैं भी जैविक खेती करूंगी। नौकरी नहीं करूंगी। मेरे मम्मी बोलती है ।आई ए एस बनना है मैं हां बोलती हूं लेकिन मुझे आई ए एस नहीं बनना है मुझे सब्जी बाड़ी में काम करना है शुद्ध फल और सब्जी उगाना है। मैं बोली आपके मम्मी पापा आपको खेती-बाड़ी करने नहीं देंगे। तो वह तपाक से बोली मैं भी बड़ी हो जाऊंगी तब करूंगी ना। अभी मैं छोटी हूं बड़ी होने पर मुझे थोड़ी ना डाटेगे ।बातें करते-करते कब घर पहुंचे पता नहीं चला ।जब व्यक्ति को वास्तविकता का पता चलता है ,तो वास्तविकता स्वीकार कर, जीने की संकल्प लेता है तो दुनिया की कोई भी ताकत उसे नहीं रोक सकता। मेहनत की खुशी उसके मन में एक नया श्रम का भाव पैदा कर दियाथा। देखते हैं मेरी पोती की नन्हीं मन आगे क्या निर्णय लेती है। जब भी मेरी पोती की मेहनत वाला चेहरा याद आता है। तो मैं आहें भर ,मेरा मन कहता है, काश ऐसे ही आने वाली पीढ़ी भी श्रम मानसिकता का हो जाए, तो भारत एक दिन जरूर आत्मनिर्भर और सम्मान के साथ जीने वाला भारत बन जाएगा।
 समझ से समाधान।
श्रम से समृद्धि।
ही देश को महान बनाता है।

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