Tuesday, July 14, 2020

रायगढ़ से गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" कृत संस्मरण- जीवन से जुड़े पल

रचनाकार-गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला- रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विषय- जीवन से जुड़े हुए पल
विधा- संस्मरण
शीर्षक- *चिन्मय*
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चिन्मय बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि की कुशलता से परिपूर्ण था। जिज्ञासा और कल्पनाशीलता जैसे उसे विरासत में ही मिली थी,मॉं के उपदेश और पिता की कहानियॉं अक्सर पीठ पर ही सो सोकर उसने सुने थे ।
        ग्रामीण परिवेश में कोई शिक्षा की उत्तम व्यवस्था न थी फिर भी "येन-केन प्रकारेण" पिता ने जुगत भिड़ाई और दाखिला प्राइवेट स्कूल में किया ।कक्षा नौवीं तक के परीक्षा परिणाम में हमेशा अव्वल आता आज चिन्मय कक्षा दसवीं के बोर्ड परीक्षा की तैयारी में लगा था ।गली चौराहों में अक्सर जिन बुजुर्गों के मुख से बधाई के शब्दांश सुनने को लालायित हुआ करता था आज उन्हीं पावन स्मरणों को जेहन में लिए मुस्कुराता हुआ अक्सर रातभर पढ़ाई करने लगा था ।
        क्रिकेट में विशेष लगाव होने के कारण बार-बार मन,घर के दूसरे कमरे में रखे बैट की ओर जाने लगा । एक अच्छा खिलाड़ी होने के नाते उसकी स्वयं की जिम्मेदारी भी थी । एक-दो मैच तो खुद शामिल भी रहा । परंतु अब फाइनल की बारी थी गांव में भी वर्षों से जीत का अकाल छाया हुआ था ।चिन्मय छुप-छुप कर माता की नजरों से अक्सर खेलने जाया करता था और आते ही किताब खोल कर बैठ जाता परंतु परसों बोर्ड का एग्जाम था और कल फाइनल का मैच। छुप कर जाना "आ बैल मुझे मार" कहने के समान था। माता की तिरछी नजर में अक्सर आसपास के लड़कों पर दौड़ने लगी थी कि कोई बुलाने न आ जाए। लाख मना करने के बावजूद जब पूरी टीम घर पहुंच आई तो ममतामयी मॉं कुछ बोल न सकी, और स्वीकृति देनी पड़ी। पर असहाय बेबस मन से कोने में बैठ कर रोने लगी, सब से शिकायत करती हुई खुद में बड़बड़ाने लग गई कि कल बोर्ड का परीक्षा है और आज क्रिकेट खेलने गया है न जाने ये लड़का जीवन में क्या करेगा? तरह-तरह के भाव मन में आने लगे।
        जैसे-तैसे दिन ढ़ला शाम का वक्त था गांव में पटाखों की गूंज और गुलाल से रंगे हुए खिलाड़ियों के कंधों पर अपने बेटे को देख मॉं और रोने लगी। आज चिन्मय को मैन ऑफ द मैच प्राप्त हुआ था अपने से एक तिहाई ऊंचाई का शील्ड लेकर घर में दाखिल हुआ,परंतु कोई उसके खुशी में शरीक न हुआ । माता-पिता बार-बार समझाते रहे कि कल परीक्षा है उसकी तैयारी कर ले, क्रिकेट खेल कर जीवन में कुछ हासिल नहीं होगा। यह बात सुन कर पीड़ित भाव से चिन्मय अब दुगुनी उर्जा से रात भर पढ़ने लगा जैसे-तैसे सुबह परीक्षा देकर आया ।इसी तरह ऊर्जा का स्तर बना रहा और संपूर्ण परीक्षा उसने पूरी निष्ठा से दिया । पांच-छह महीने बाद परीक्षा का परिणाम आना था सब में कौतूहल और चिन्मय के मन में एक अजीब सी कशमकश बनी हुई थी। पूरे ब्लॉक में 92% के साथ चिन्मय प्रथम था और जिस विषय के पूर्व उसे लाख ताने सहकर क्रिकेट खेलने जाना पड़ा था उसमें उसके अंक 100 में 100 थे । शिक्षकों- दोस्तों-सहपाठियों सबकी शुभकामनाएं घर पहुंचने लगी । परिणाम जानकर मॉं बाहर से मुस्कुराती मन ही मन रोने लगी थी अपने बेटे का मस्तक चूम कर नम आंखों से कहने लगी कि अब जीवन में जो कुछ करेगा तुझे कुछ नहीं कहूंगी जितना मन करे खेलना,जितना मन करे पढ़ना ।चिन्मय के चेहरे में भी हंसी और खुशी दोनों के भाव झलकने लगे थे, भावनाएं आंसू के रूप में बाहर बहने लगे थे।
       हम अक्सर भाव-आवेश में आकर अपने बच्चों की जिज्ञासा व उनकी निर्णयों को कई बार नजरअंदाज कर देते हैं । हमें आने वाली युवा पीढ़ी का नेतृत्व सोच समझकर करना होगा, इन्हीं बच्चों में भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, बटुकेश्वर दत्त, राम प्रसाद बिस्मिल जैसे अनगिनत महानायक अवतरित होने वाले हैं।

और अंत में-
"नादॉं हूं पर मुझे नादान न समझ,
आजाद हूं मुझे अनजान न समझ ।
और नायाब हीरा हूं तराश ले मुझे,
फावड़ा उठा कोयले की खदान न समझ ।।"

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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

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