महासमुन्द, छत्तीसगढ़
शीर्षक;"किसानी के नाँगर"
विधा-गीत(छत्तीसगढ़ी)
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अइसन जम के बरसे तैंहा बादर,
अब तो चलगे किसानी के नाँगर।
किसानी खेती के दिन हा भदरगे,
किसनहा होगे एक मन के आगर।।
बोहे खाँध म नाँगर हाथ म तुतारी,
झंऊँहा म बासी पेज टँगिया कुदारी।
चलय सुवारी धरके रोटी अँगाकर....…
अब तो चलगे....................
मुँड़ म पहिरे खुमरी कोनो ताने छाता,
मोरा ओढ़े दाई कूदे मेंचका परखाता।
बरछा म बोंवाए हे कुसियार मलागर.....
अब तो चलगे …...................
बारी म छछले हावय बरमसी करेली,
सावन अंधियारी पाख होवय हरेली।
पूजा बर माढ़े लोहा औजार साबर…....
अब तो चलगे….....................
ओइरछा चूहय कोठ म रेला बोहावय,
मोरी पेकपेकागे गली गल्ला बोहावय।
पेट भरके खाही उही जेन चलाही जाँगर…
अब तो चलगे किसानी के नाँगर।
किसानी खेती के दिन हा भदरगे,
किसनहा होगे एक मन के आगर।
अब तो…............
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