स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
शीर्षक -"नारी"
विधा- छंदमुक्त कविता
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नर में बड़ी मात्रा जुड़ बनी तू नारी
सृष्टि की जननी बनी पहन तू सारी
जननी को जनने वाली जगत महतारी
दुनिया को गढ़ने वाली गणोंं की प्यारी,
तू दुर्गा और ज्ञान रूपी वीणापाणि
तेरी महिमा का गुणगान करें दुनिया सारी
नर में बड़ी मात्रा जुड़ बनी तू नारी
सृष्टि की जननी बनी पहन तू सारी
अन्न का भंडार भरती लक्ष्मी न्यारी
विकट परिस्थिति में बनती तू ही काली
धरा पर जल धारा लिये नद्या सारी
तू कहां नहीं ,ये बताये जगत मुरारी
नर में बड़ी मात्रा जुड़ बनी तू नारी
सृष्टि की जननी बनी पहन तू सारी
राधा बन प्रेयसी बनी मीरा बन वैराग्य धरी
सीता रूप में पति संग वनवास को चली
अनुसूईया बन त्रिदेव को गोद उठाली
द्रोपदी होकर अन्याय न सहने वाली
तू ही अर्धांगिनी हुई बन के घरवाली
तू ही लाली बन लाल पे जाए वारी वारी
नर में बड़ी मात्रा जुड़ बनी तू नारी
सृष्टि की जननी बनी पहन तू सारी
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