जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
शीर्षक - " मुंशी प्रेमचंद "
विधा - छंदमुक्त
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उदित हुआ साहित्य का सूरज,
वाराणसी के लमही गाँव में।
पिता मुंशी अजायबराय,
बचपन बीता ममतामयी,
माँ आनंदी के छाँव में।।
शिक्षा प्रारंभ जिसने उर्दू फारसी से किया,
बालपन में ही तिलिस्मे होशरूबा पढ़ लिया था।।
समय एक था जब सामाजिक आँदोलन हुआ,
मुंशी जी ने ही विधवा-विवाह का समर्थन किया था।।
भ्रष्टाचार और जमींदारी पर,
रचना आजीवन लिखते रहे।
कलम का सिपाही कलम से अपने,
गरीबी दैन्यता की कहानी कहते रहे।।
मन के अपने विचारों को,
समाज के समक्ष प्रस्तुत किया।
अपने अनमोल रचनाओं से,
साहित्य जगत को मजबूत किया।।
मिल का पत्थर उपन्यास इनकी,
गबन कर्मभूमि और गोदान।
प्रेमाश्रय और कायाकल्प का भी,
है साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान।।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रेम जी,
थे अनोखे उपन्यासकार।
दलित स्नेह, नारी सम्मान सिखाया,
ऐसे महान थे ये कलमकार।।
हिन्दी को पाला पोसा भी,
नया एक संस्कार दिया।
साहित्य को आम जनता से जोड़कर,
सच्चाई जीवन की उतार दिया।।
गरीब किसान का दर्द बताने वाले।
खूबसूरती से लेखनी में उतारने वाले।
नमन उस महान आत्मा को,
जो साहित्य के लिए ही थे जीने वाले।।
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