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रचनाकार:-एच-एस-अरमो"अरमान "
स्थान--बैरन-बाज़ार,रायपुर ।
जिला--रायपुर,छत्तीसगढ़ ।
विधा--छ्न्द-मुक्त (कविता)
शीर्षक-"कलम का सिपाही "
(मुन्शी प्रेमचन्द जी को सादर
समर्पित)
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《○》कलम का सिपाही 《○》
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लमही(इलाहाबाद)में अवतरित हुआ,
31जुलाई,1880को एक ध्रुव तारा,
धनपतराय नाम से,उभरकर आया,
बाद में,मुंशी प्रेमचंद से,ख्याति पाया ।
बचपन में माँ-बाप का,उठ गया साया,
रोजी-रोटी की आफतों से घिर आया,
टयूशन कर,मैट्रिक की शिक्षा कर पाया
मास्टरी कर,इंटर,बी-ए-की शिक्षा पाया ।
बचपन में,फारसी भाषा ज्ञान को पाया
हादसो ने,साहित्य अध्ययन को जगाया
नौकरी के तबादले ने,लोगों को जाना,
हिंदी,उर्दू,फारसी व अन्ग्रेजी ज्ञान पाया ।
बीते समय के कटु-सत्य बातों को जान पाया,
उन बातों को,अपने साहित्य में दिखा पाया,
पंच परमेश्वर,बूढ़ी काकी,गबन जैसी
सामाजिक-साहित्यिक,मार्मिक बातें,
"साहित्य समाज का दर्पण है"बताया।
8फर-1921को गाँधी जी से मिला ,
उनके आव्हान पर,नौकरी को त्यागा,
"मर्यादा,माधुरी"पत्र का सम्पादन किया
"हंस,जागरण"पत्र,स्वयं का चलवाया,
सफल नहीं हुआ,पर कर्ज में डूब गया।
फिर जीने के लिए,बँबई चला आया,
वहाँ के रँग-ढंग,मुझे एक न भाया,
मजबूरन लौटकर,बनारस में आया ।
जिन्दगीं के संघर्षों ने,मुझे खूब थकाया
फिर जलोदर रोग ने मुझे जकड़ लिया,
8अक्तूबर1936को देह को छोड़ दिया
साहित्य-सम्राट का ,ऐसा अंत हो पाया ।
दूनियाँ में,हिंदी-उर्दू कहानी का परचम लहराया,
और आधुनिक कहानी,का जन्मदाता कहलाया,
लगभग तीन सौ कहानियाँ व चौदह छोटे-बड़े उपन्यासों की रचना किया,
सँसार के महान् लेखक होने का मान बढ़ाया ।
कालजयी साहित्यकार होने की महिमा
उनके पाठकों की लालसा ने बनाया ,
अपनी अमूल्य कृतियों व रचनाओं
की धरोहर,हमारे लिए,छोड़ गया ।
आओ महान् कथाकार,उपन्यासकार,
कलम का सिपाही ,से विभूषित को,
उनकी 141वीं जयंती के अवसर पर,
श्रद्धा सुमन अर्पित व शत शत नमन ।
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व्याख्या-उपरोक्त रचना में श्रद्धेय मुन्शी प्रेमचन्द जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए,उनके जीवन की कुछ बातें आपके समक्ष प्रस्तुत किया है ।
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