जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक:- बदल रहा है इंसान
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एक अद्भुत कृति ईश्वर का,
कहलाता है जग में मानव।
धीरे - धीरे बदलावों से,
बन गया है आज वह दानव।
सबसे पहले दुनिया में,
एक नर और एक मादा आए।
दो से चार और चार से आठ हो,
धीरे से है फौज बढ़ाए।
पहले पहल मानव घूमता था,
यहां- वहां वसन विहीन।
फिर पहना छाल और पत्ते,
अब पहने कपड़े रंगीन।
चलते पहले चौपाए थे,
दो पैरों में सरपट दौड़ लगाए।
फिर आया चक्को का दौर,
बैठे बैठे वाहन चलाए।
रहते थे जंगलों में कभी,
धीरे से गुफा में आए।
फिर आए कच्ची झोपड़ी में,
अब वे पक्के महल बनाए।
घूमा करते यहां वहां वे,
फिर उसने कबिला बसाया।
कबिले से गांवों तक आए,
फिर गांवों को शहर बनाया।
कंद मूल खाते थे पहले,
फिर मांस को कच्चा खाया।
फिर किया उसने खोज आग की,
सारा खाना उसमें पकाया।
करना जो होता विचार का,
जब भी उन्हें आदान प्रदान।
कर लेते बस इशारा,
या चित्रों से खिंचे ध्यान।
फिर सिखा भाषा का ज्ञान,
पढ़ने - लिखने का रखें वे ध्यान।
भिन्न-भिन्न यंत्रों को खोज,
खोज लिया उसने विज्ञान।
जब से खोजा उसने विज्ञान,
चाहे बदलना विधि - विधान।
धीरे-धीरे बदल लिया है,
रहन सहन और खान पान।
देख सुंदर रूप प्रकृति का,
पहले किया मानव ने भ्रमण।
ज्यों ज्यों बढ़ी जरूरत इसकी,
करने लगा है अब अतिक्रमण।
दशा धरा की ऐसे कर दी,
मन ही मन करती है रूदन।
मस्त मौला निज स्वार्थ को,
कर रहा धरा का दोहन।
जिसने दिया यह अनमोल जीवन,
ना रखता उसका मानव मान।
है लालची, स्वार्थी बड़ा यह,
आज बदल रहा है इंसान।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने मानव और मानव सभ्यता के बदलते रूप को अपने शब्दों में पिरोने का प्रयास किया है।
रचनाकार ने विभिन्न पहलुओं को परिलक्षित करते हुए मानव में हुए बदलाव को प्रकट करने का प्रयास किया है।
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