लैलूंगा, जिला-रायगढ़
विधा-मुक्त छंद (मानव का उत्थान)
शीर्षक- क्या विकसित हो पाया??
नित नव सृजन करता
मानव आज चांद में पांव रख आया
पर क्या सचमुच वो विकसित हो पाया?
लाखों वर्ष पूर्व जिन जंगलों में आशियाना था
आज उन्ही जंगलों को काट ,जला आया
कच्चे मांस से भूख मिटाता था कभी
आज भी खुद को कहां अलग कर पाया
क्या सचमुच वो विकसित हो पाया?
बन्दरों जैसे पेड़ों पर उछलता था कभी
आज भी आगे बढ़ने की होड़ में
शहरों और देशों में ही उलझता रहा
नंग-धड़ंग घूमता था जो कभी
आज भी शरीर की नुमाइश ही उसे भाया
क्या सचमुच वो विकसित हो पाया?
सभ्य बनने में लाखों वर्ष गुजार दिए
आज फिर असभ्यता ही उसे भाया
मानव ने विकास तो बहुत की
पर क्या सचमुच वो विकसित हो पाया?
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