जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
शीर्षक - " गाँव के सुरता "
विधा - छंदमुक्त
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बर पीपर के छांव,
अब्बड़ सुग्घर मोर गाँव।
पहली रखे जहां पांव,
सेन्दुरस मोर गाँव।।
हंसी ठिठोली के ओ दिन संगी हो,
मोला बिक्कट सुरता आथे जी।
बांटी-भौंरा के दिन नंदा गे,
अब मोबाइल म दिन पहाथे जी।।
बिहनिया बिहनिया के बेरा संगी हो,
मोला निच्चट मन ल भाथे जी।
चिरई चुरगुन के कोयली बोली सुन के,
मोर दाई ह मोला उठाथे जी।।
बड़का दाई ह घलो अब जंगावत हे।
चहा पीये बर मोला बलावत हे।।
बेटा तैं उठ, बेरा ह अब पहावत हे,
ओ दे सुन तो, खईरखा ह घलो ढिलावत हे।
झउहाँ ल धर के नोनी ह चल दिस,
एक चोंता करिया बइला ह हागिस,
जोर-जोर से चिल्लावत हे।।
पताल के चटनी सील-लोढ़हा म पीसें,
बने हे अंगाकर रोटी।
भात रांधे बर निमार घलो डारें,
चाऊर ले कोदो-गोंटी।।
दाई चटनी ह अब्बड़ मिठावत हे।
मन हर खाय बर बिक्कट खंखावत हे।।
अन्हां ह घलो आगिस,
चाऊर ल तैं डाल देबे।
कोठना के पानी ह सिरागे,
कांदी ल तैं लान देबे।।
नंगरइया मन अब काम बुता म जावत हे।
नांगर फांदे बर तोर तो जाँगर ह सिरावत हे।।
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अति सुंदर मामा जी👍👍👍
ReplyDeleteVery good bhaiya ji
ReplyDeleteVery good bhaiya ji
ReplyDeleteVery nice sir
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