ग्राम - बुलाकी
जिला - रायगढ़ छत्तीसगढ़
विधा - कविता
शीर्षक - **मेरा गांव**
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*मेरा गांव**
मेरा गांव बड़ा अलबेला,
मैं इसकी मिट्टी में खेला।
कच्चे-पक्के घर बने हैं,
गांव -गली दमकने लगे हैं।
गली- गली में बिजली बत्ती,
गंदे पानी नाली से निकलती।
यहां मेल-जोल भाईचारा है,
मेरा गांव मुझको प्यारा है।
गांव, गली, चौराहे, द्वार,
लिपे-पोते आंगन-द्वार।
अनेक मनाते तीज-त्यौहार,
खुशियां मनाते द्वार-द्वार।
अनपढ़ पढ़ा-लिखा गांव ,
बट, पिपल, महुआ का छांव।
प्राथमिक, मिडिल,आंगनबाड़ी,
पढ़ते बच्चे, खेलते खिलवाड़ी।
ताल, पोखर, नाला, नदी,
सदैव रहती उसमें पानी।
खेत, खलिहान, टिकरा, मैदान,
बाग-बगीचा खेतों में धान।
नाला किनारे सब्जी बाड़ी,
चारों तरफ खेत हरियाली।
कुंदरू, करेला, बैंगन, मिर्ची,
लगी है, सब्जी की खिचड़ी।
मेथी, सरसों, पालक, लाल,
टमाटर पका है लाल-लाल।
उड़द, मूंग, अरहर का दाल,
लगा है मूंगफली टिकरा टाल।
जौ, ज्वार, बाजरा, मक्का,
लता नार में लौकी लटका।
डोडका, तोराई, करेला नार,
लगे हैं गांव के खारिन खार।
खीरा, ककड़ी, बोंगला, तरबूज,
आम, इमली, बेर, खजूर।
अमरूद, पपीता, मेड-पार,
कटहल लगा है आर-पार।
पेड़-पौधे घने जंगल,
लोग मनाते जंगल में मंगल।
तोता, मैना, गौरैया, कबूतर,
कलरव करते चहल-पहल।
गाय, बैल पशुओं का बथान,
खेती करते हर किसान।
मुर्गा-मुर्गी भेड़ बकरी,
कुत्ता, चूहा और बिल्ली।
कछुआ, सांप, घोंघी, केकड़ा,
पतंगा, तितली, भंवरा, मकड़ा।
ऐसा है मेरा गांव का स्वरूप,
कहीं दादुर तो कहीं झींगुर।
मेरा गांव लगता है न्यारा,
मुझको प्यारा सबको प्यारा।
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व्याख्या- कवित्री इस कविता के माध्यम से अपने गांव का स्वरूप का वर्णन की है।
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उर्मिला सिदार
बुलांकी रायगढ़(छग)
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