Saturday, July 25, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचवा- गाँव

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
   शीर्षक  -  " गाँव के सुरता "
     विधा - छंदमुक्त  
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बर पीपर के छांव,
अब्बड़ सुग्घर मोर गाँव। 
पहली रखे जहां पांव, 
सेन्दुरस मोर गाँव।। 

हंसी ठिठोली के ओ दिन संगी हो, 
मोला बिक्कट सुरता आथे जी। 
बांटी-भौंरा के दिन नंदा गे, 
अब मोबाइल म दिन पहाथे जी।। 

बिहनिया बिहनिया के बेरा संगी हो, 
मोला निच्चट मन ल भाथे जी। 
चिरई चुरगुन के कोयली बोली सुन के, 
मोर दाई ह मोला उठाथे जी।। 
बड़का दाई ह घलो अब जंगावत हे। 
चहा पीये बर मोला बलावत हे।। 

बेटा तैं उठ, बेरा ह अब पहावत हे, 
ओ दे सुन तो, खईरखा ह घलो ढिलावत हे। 
झउहाँ ल धर के नोनी ह चल दिस, 
एक चोंता करिया बइला ह हागिस, 
जोर-जोर से चिल्लावत हे।। 

पताल के चटनी सील-लोढ़हा म पीसें, 
बने हे अंगाकर रोटी। 
भात रांधे बर निमार घलो डारें,
चाऊर ले कोदो-गोंटी।। 
दाई चटनी ह अब्बड़ मिठावत हे। 
मन हर खाय बर बिक्कट खंखावत हे।। 

अन्हां ह घलो आगिस, 
चाऊर ल तैं डाल देबे। 
कोठना के पानी ह सिरागे, 
कांदी ल तैं लान देबे।।
नंगरइया मन अब काम बुता म जावत हे। 
नांगर फांदे बर तोर तो जाँगर ह सिरावत हे।।     
     
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