जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-एकादश होने तक
विधा-कविता (मुक्त छंद)
मुश्किल दिनों में
शिक्षा को मशाल
बना और फिर
चल अंधेरी
रात में जगनू
की तरह
सबेरा होने तक।
आत्म विश्वास
की नाव पर
सवार होकर
धीरज रख
सीपी निकाल
ही लोगे
बलखाती
लहरों के बीच।
जिन पायल की
छम-छम को
कभी संगीत
बनाया तुमने,
उसे मल्हार बना
संघर्ष के गीत
गाने को।
गर्दिश के तारे भी
राह दिखायेंगे
आओ मांगों
टूटते तारों से
हौसला कि
जोड़ सको
एक और एक
को एकादश
होने तक।।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
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