जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- हमर संस्कृति नदावत हे।
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हरियर लुगरा दाई के,
ददा के हरियर धोती।
साड़ी, शूट, पेंट, शर्ट के आए,
गवां गे कती कोती।
गंवागे मया पिरीत,
बोली भाखा गंवावत हे।
भुलावत हन तैहा के गोठ,
हामर संस्कृति नदावत हे।
नानपन के तिज तिहार,
अऊ किसम किसम के खेला।
मोबाईल टिवी जबले आइस,
लगे जी झमेला।
बटकी ले बासी चटनी,
तावा म रोटी नदावत हे।
भुलावत हन तैहा के गोठ,
हामर संस्कृति नदावत हे।
टेक्टर अइस जबले,
बैला गाड़ी के सुरता भुला देन।
कांची कुडही, पुतला पुतली के,
खेला ला बिसरा देन।
गंवई म गम्मत के मजा,
जाने कती गंवावत हे।
भुलावत हन तैहा के गोठ,
हामर संस्कृति नदावत हे।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने छत्तीसगढ़ से विलुप्त होते प्राचीन संस्कृति पर दुख व्यक्त करते हुए पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव को शब्दों में पिरोने का प्रयास किया है।
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