रायगढ़, छत्तीसगढ़
विषय-मुंशी प्रेमचंद
विधा-मुक्त छंद
शीर्षक- हिंदी के पितामह
हिंदी के पितामह मुंशी प्रेमचंद
उन सा ना कोई था न होगा
साहित्य को उनका योगदान
ना कोई भुला ना भूलेगा
सामंतवाद, पूंजीवाद और
शोषण के प्रति क्रोध
बरबस ध्यान खिंचता
ग्रामीण परिवेश, और
अभावों में पलता कृषक
परिवारों की व्यथा
होरी,हल्कू और बूढ़ी काकी
के मन के अंतर्द्वंद्वओं
को झलकाता उनकी कथा
खेतों की पगडंडियों
की सैर कराता,उनके
कष्टों की मर्म समझाता
ऐसे कहानीकार और
उपन्यासकार प्रेमचंद
को शत-शत नमन
युग प्रवर्तक, समाज-सुधारक
कलम के सिपाही प्रेमचंद
का शत-शत अभिनदंन
सेवासदन, कर्मभूमि, रंगभूमि
प्रेमा, गबन,गोदान हो या
पूस की रात,दो बैलों की आत्मकथा,
पंच-परमेश्वर, हो या कफ़न
हर किरदार को जीवंत करता
हमे उनसे जोड़ता प्रेमचंद
को शत-शत नमन।
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