Tuesday, July 21, 2020

ममहासमुन्द से विनोद कुमार"जोगी" जी की कविता:-टूटते ख्वाब

रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
विषय :- ख्वाब
शीर्षक :- टूटते ख्वाब

#######################

अक्सर तन्हाई में बैठे,
खो जाता हूं ख्वाबों की दुनिया में।
उड़ने लगता हूं बिन पंख के,
मनमोहक वादियों में।
चुन लेता हूं मन ही मन में,
मखमली रास्ते मंजिल तक।
बुन लेता हूं ख्वाब में ही,
एक आलिशान आशियाना।
कि चाहत हूं अफ्सर बनने की,
पहन सूट बूट ठनने की।
अक्सर ख्वाबों में ही,
मिल जाती है नई यूक्ती।
मन ही मन हो जाती है,
अच्छे ओहदे पर नियुक्ति।
ख्वाबों की दुनिया में ही,
मैं रौब दिखाता हूं।
देकर आदेश चमचों को,
मन ही मन मुस्काता हूं।
कि अचानक से तभी ही,
बिखर जाते हैं सारे अरमान।
गिर जाता है मन व्योम से धरा में,
जीवन की सच्चाई जान।
टूट जाता है जब अनायास ही ख्वाब,
छूट जाता हैं पीछे ख्वाबों का रौब।

######################

व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने अपने ख्वाबों में पिरोए जाल को प्रकट करने का प्रयास किया है, वे कहते हैं कि किस प्रकार सपनों में उसे अपने इच्छा अनुरूप सारी चीजें मिल जाती है। वह इन सब बातों का खुशियां मनाते रहता है तभी ख्वाब टूट जाता है।

No comments:

Post a Comment

दुर्ग से प्रिया गुप्ता की रचना- चाहत

कवि-प्रिया गुप्ता जिला- दुर्ग राज्य-छत्तीसगढ़ शीर्षक-चाहत विधा-काव्य संपर्क-7974631528  दीवानगी दीवानों की वफ़ा है दोस्तो   काति...