रचनाकार :- विनोद कुमार "जोगी"
जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
विषय :- ख्वाब
शीर्षक :- टूटते ख्वाब
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अक्सर तन्हाई में बैठे,
खो जाता हूं ख्वाबों की दुनिया में।
उड़ने लगता हूं बिन पंख के,
मनमोहक वादियों में।
चुन लेता हूं मन ही मन में,
मखमली रास्ते मंजिल तक।
बुन लेता हूं ख्वाब में ही,
एक आलिशान आशियाना।
कि चाहत हूं अफ्सर बनने की,
पहन सूट बूट ठनने की।
अक्सर ख्वाबों में ही,
मिल जाती है नई यूक्ती।
मन ही मन हो जाती है,
अच्छे ओहदे पर नियुक्ति।
ख्वाबों की दुनिया में ही,
मैं रौब दिखाता हूं।
देकर आदेश चमचों को,
मन ही मन मुस्काता हूं।
कि अचानक से तभी ही,
बिखर जाते हैं सारे अरमान।
गिर जाता है मन व्योम से धरा में,
जीवन की सच्चाई जान।
टूट जाता है जब अनायास ही ख्वाब,
छूट जाता हैं पीछे ख्वाबों का रौब।
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