रचियता-मोनालिसा बेहरा
रायगढ़ , छत्तीसगढ़
विधा-छंद मुक्त
विषय- ख्वाब पर आधारित कविता सृजन
शीर्षक-ख्वाबों का सफर
है ख्वाबों का सफर निराला
काली-अंधेरी रात में आकर
मुझे अपने रंग में रंग डाला
ले गया अपने साथ गगन से दूर
और बर्षा गया चेहरे पे नूर
चांदनी बिखरी थी चारों ओर
खिंचे जा रहा था अपनी ओर
ऐसी सुंदर-सुहावनी बेला में
विचर रहे थे हम दिलो की मेला में
आज ख्वाबों को पलकों पे रोक
लेने की चाहत उठ रही है दिल में
ये ख्वाब भी कितने अजीब होते हैं
न मुक्कमल पूरे होते हैं ,न जीने देते हैं
पर ख़्वाबों का सफर सुहावना होता है
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