जिला :- महासमुंद
विधा :- संस्मरण
शीर्षक :- सांप का खेल।
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बात वर्षों पुरानी है जब मैं अपने बालपन के उन्माद में अविरल बह रहा था। तब मैं बहुत शैतान था, अक्सर कभी पड़ोसियों को, घरवालों को और विभिन्न जीवों को परेशान किया करता था। मैं अधिकतर एक विशिष्ट प्रकार के सांप के साथ खेला करता था, जो की जहरीला नहीं था। बस गुस्सा आने पर जब काट लेता तो बहुत रक्त स्त्राव हुआ करता था।
बारिश का मौसम था, हम सभी दोस्त हमारे घर में एकत्र हुए थे, जहां से हमें स्कूल जाना था। तभी एक काला गोला छपाक से आंगन में गिरा, तकरीबन 15 से 20 पिटपिटी सांप का गोला था। गिरते ही वे इधर उधर बिखरने लगे, तभी हमने पूंछ पकड़ उन सांपों को जोर जोर से घुमाने लगे, और फिर उन्हें जोर से छोड़ देते, जिससे वे दूर जाकर गिर रहे थे।
उस दिन की मस्ती बहुत ही मजेदार थी, कुछ ही देर बाद हम स्कूल चले गए थे। कुछ दिन बाद हुआ यूं कि मैं नहाने के लिए तालाब जा रहा था। रास्ते में एक पत्थरों की दीवार थी जिसमें पत्थरों के बीच की दरार में एक सांप अपना सर निकालकर देख रहा था। उसे देखते ही मेरे मन में शरारत का कीड़ा काटने लगा। प्रथम दृष्टया वह भी पिटपिटी सांप ही लग रहा था। मैं उसके सिर को हाथों से छेड़ने लगा, सांप चुपचाप सर अंदर कर लेता और फिर थोड़ी देर बाद सर बाहर निकालता।
मैं और सांप ऐसे ही कुछ देर मस्ती कर रहे थे की तभी पास से एक चाचा गुजरे, उन्होंने मुझे कहा - क्या कर रहे हो बेटा, मैंने बोला पिटपिटी सांप से खेल रहा हूं। वे जब ध्यान से देखे तो फटकारते हुए बोले - अरे पागल भाग वहां से यह कोई पिटपिटी नहीं बल्कि करैत है, एक जहरीला सांप है, जिसका काटा पानी भी नहीं मांगता।
चाचा की बात सुनकर मेरे पांव तले से जमीन हट गई, और मैं वहां से दुम दबाकर भाग खड़ा हुआ। तब से मैंने सांप के खेल से तौबा कर लिया।
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