Tuesday, July 14, 2020

रायपुर से एच-एस-अरमो कृत संस्मरण:- भूल


रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
जिला--रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
शीर्षक-"भूल"
विधा--"संस्मरण लेखन"
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        ""भूल ""
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     जब मैं अपने शहर बालाघाट में मिडिल स्कूल के कक्षा आठवीं में पढ़ रहा था ।ऐसे ही बरसात का मौसम था ।मेरे मोहल्ले का एक साथी मेरे ही स्कूल में पढ़ता था और एक साल फेल हो जाने के कारण हमारे बराबर की कक्षा आठवीं में पढ़ाई करना पड़ा ।उसके साथ एक दिन रात में तेज मुसलाधार बारिश हुई और शहर के पास से एक नदी जिसका नाम वैनगंगा था,में बाढ़ आ गईं थी और सड़क पुल के थोड़ा नीचे से पानी बह रहा था ।उसी दिन स्कूल से आने के बाद,घर पर खाना खाने के बाद हम दोनों उसकी सायकिल पर सवार होकर बाढ़ देखने के लिए निकल पड़े,मजे की बात है कि वह नया-नया ही सायकिल चलाना सीखा था ।यहाँ तक कि हमनें अपने घर वालों को भी नहीं बताया था और चुपचाप निकल पड़े थे ।जब नदी के किनारे पहुंचे तो और भी लोग बाढ़ देखने के लिए आये हुए थे ।वहां आसपास चाय,चना -मुँगफल्ली के हाथ ठेले लगे हुए थे ।उस समय हमारे पास में सिर्फ़ पचास पैसे ही थे,हमनें पच्चीस पैसे की भुनी हुई मूंगफली ली और बाढ़ देखते हुए छिलके निकाल कर उसको खाने का मजा ले रहे थे ।बाढ़ में बह -बहकर जंगल की लकड़ियां आ रही थीं जिसे कुछ जरुरतमंद लोग रस्सियों को फेंक कर और कुछ लोग बाँस का एक छोर में सिन्कँजा बाँध कर पानी में फेंकते हुए लकड़ियाँ निकाल रहे थे और हम मजे के साथ देख रहे थे ।लगभग चार बजे के आस-पास हम दोनों पुल को पार कर दुसरे किनारे की ओर चले गये और वहाँ से बाढ़ के पानी के उतार-चढ़ाव व कल-कल ध्वनि का आनंद लेते हुए देख रहे थे ।फिर अचानक मेरे दोस्त को याद आया की मेरे रिश्तेदार यहाँ से लगभग पन्द्रह किलोमीटर की दूरी पर वारासिवनी में रहते हैं,उसने मेरा नाम लेते हुए कहा कि चले वहाँ से घूमकर आते हैं,मैं थोड़ी देर तो सोचता ही रह गया था,फ़िर मैंने कहा कि अच्छा चलों पर ध्यान रखना बस उनसे मिलकर जल्द वापस आ जायेंगे ।उसने उसका जवाब देते हुए कहा कि अभी तो चार बजकर बीस मिनट ही तो हुए हैं ।हम तो शाम तक वापस आ ही जायेगें,फिर हम लोग वहाँ से निकल पड़े ।वारासिवनी लगभग साढ़े पांच बजे पहुँच गए थे ।वहाँ कुछ देर बाद बैठकर वापस लौट गए किन्तु जैसे ही नदी के किनारे पर पहुंचे,तो क्या देखते हैं कि बाढ़ का पानी पुल के ऊपर से तीन-चार फुट तक बह रहा है ।हमारे तो हाथ-पैर फूल गए ।कुछ देर इधर-उधर देखते रहे और आपस में बात करते रहे की बाढ़ तो शायद ही जल्दी उतरेगी ।वहां और भी लोग इस मुसीबत में फंस गये थे,उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी तो पानी लगातार बढ़ ही रहा है,कम होने के बिलकुल आसार नज़र नहीं आता है ।हम दोनों अब अन्दर ही अन्दर घबरा गए और सोचने लगे की क्या करना चाहिए,उतने में अचानक याद आया कि अपना एक साथ में पढ़ने वाला नजदीक के गाँव में रहता है ।उसने पूछा यहाँ से कितनी दूर है,मैंने कहा लगभग ढेड़ किलोमीटर की दूरी पर रहता है,तो उसने कहा अच्छा चलो,चलतें हैं ।वह मुझे थोड़ा-थोड़ा जानता है और उसके घर वालों से कोई पहचान नहीं है,उसने कहा ठीक है,चलकर देखते हैं ।हम वहाँ से निकल पड़े और उसके घर पहुंचे,पर रास्ते में बूँद बूँद कर पानी गिरते रहने के कारण हम दोनों बहुत भींग गये थे ।क्योंकि हमारे पास छतरी भी नहीं थी,इसका मुख्य कारण है कि हम घर से चुपचाप जो निकले थे ।वहाँ दोस्त तो मिला,थोड़ा अँधेरा हो गया था,उसने तपाक से पूछा--कुछ आश्चर्य होते हुए -? मैंने कहा कि अरे यार क्या करूँ हम दोनों के शौक ने,हमें इस मुसीबत में डाल दिया है ।उसने कहा कि अच्छा-अच्छा बताओ तो क्या बात है-? हमने अपनी पूरी राम-कहानी सुनाई ।उसने बड़े ध्यान से सुना और कहा कि रेलवे पुल के ऊपर से कुछ लोग पार होते हैं,क्या ! तुम उसके ऊपर से पार होकर जा सकते हो-? हमने कहा कि कभी इसे पार ही नहीं किया है और हमने सुना है कि उसके ऊपर से गुजरने पर बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है और बाढ़ के पानी की तेज गति से बहने की वजह से भयानक आवाज़/शोर होता है ।हमने कहा कि ऐसे में तो हम बिलकुल नहीं जा सकते हैं ।उसने कहा कि तो फिर एक काम कर सकते हैं ।तुम मेरे यहाँ सायकिल रख सकते हो और अभी थोड़ी देर बाद रेल यहाँ से बालाघाट के लिए जाने के लिए आने वाली है ।मैंने कहा कि यार हमारे पास तो पैसे भी नहीं हैं ।उसने कहा कि कोई बात नहीं है,मेरे दादाजी ने टिकट काटने का ठेका लिया हुआ है ।तुम मेरे यहाँ सायकिल रखकर जा सकते हो-? मेरे साथ आये दोस्त ने कहा कि इसको रेल से तुम भेज दो,मैं तो अपने रिश्तेदार के यहां वापस चला जाऊँगा ।मैंने कहा कि जैसी तेरी मर्जी ।उसने हमें रेलवे स्टेशन पर ले गया और एक टिकट लिया,जिसकी कीमत उस समय मात्र पच्चीस पैसे ही थी ।कुछ देर इन्तज़ार करने के बाद रेल प्लेटफार्म पर आई ।उस समय रेल खनिज कोयला से चलती थी और गहरा काला धुंआ भी निकालती थी और उसकी सिटी की आवाज भी थोड़ी अजीब सी लगती थी और चलने पर छुक-छुक की ध्वनि निकलती थी ।यहाँ तक कि उसकी चाल भी उतनी तेज रफ्तार की नहीं होती थी ।कभी-कभी धुएँ के साथ हल्का सा कोयला जलता हुआ कण/राख के रुप में उड़कर डिब्बों की ओर आते रहते थे और धुआँ भी अजीब सा बदबू  करता था ।चूँकि बरसात का मौसम और बाढ़ के कारण रेल खचाखच भरी हुई थी,जैसे-तैसे मैं रेल के डिब्बे के भीतर दाखिल हुआ ।मेरे लिए तो एक अजीब बात यह थी कि मैं पहली बार रेल में यात्रा कर रहा था ।सावन का महीना और हल्की फुल्की बारिश हो रही थी ।जिसकी फुहार रेल चलने के कारण अन्दर की ओर जैसे जान बुझकर घुसने की कोशिश करना चाह रही है ।ब्रिटिश सरकार के समय की रेल होने के कारण बैठक-व्यवस्था आज के हिसाब तो बिलकुल भिन्न व तंग सी थी ।यहाँ मैं उस समय की परिस्थितियों से अवगत कराने की कोशिश की है ।मेरा गाँव का साथी तो रेल के चलते ही हाथ का इशारा करते हुए घर की ओर बढ़ता गया और मैं रेल की गति के साथ अपने मन को भरमाने का प्रयास करता रहा ।मेरे साथी ने कहा था कि मैं तो अपने रिश्तेदार के यहां वापसी जा रहा हूँ ,पर तुम बालाघाट पहुंचने के बाद मेरे घर जाकर बतला देना ।मैंने उस वक़्त सिर्फ़ हाँ में अपना सिर हिला दिया था ।जैसे-जैसे मेरा शहर नजदीक आता गया,दिल की धड़कन भी बढ़ती रही और सोचता रहा कि मैं उसकी मम्मी को कैसे व किस तरह बताऊंगा-?जैसे-तैसे रेलवे स्टेशन पर रेल प्लेटफार्म पर पहुँच कर एक झटके के साथ रुकी ।मैं भी भीड़ का एक हिस्सा था,डिब्बे से उतरकर धीरे धीरे धीरे हारे हुए जुआरी की तरह कदम बढ़ाता चला और प्लेटफार्म के बाहर निकलने के पहले टिकट दिखाना जरूरी होता था और उस टिकट को जमा भी कर लिया जाता था ।उस टिकट पर तारीख़ की मुहर लगी होती थी,जिस कारण उसका दुबारा उपयोग नहीं किया जा सकता है ।मैं प्लेटफार्म से बाहर निकलने के बाद तेजी के साथ आगे बढ़ा और पैदल घर की ओर चलते-चला ।सबसे पहले तो मेरे दोस्त का घर मोहल्ले में आता था ।मैं उसके घर के सामने खड़ा हुआ और थोड़ी हिम्मत जुटा उसके घर का बंद दरवाजे को बाहर लगी संकल से ढोककर बजाया,कुछ देर बाद अन्दर से आवाज आई,कौन हो!मैंने दबी जुबान में कहा मैं (अपना नाम लेकर) हूँ ।उतने में दरवाज़ा खुला और उनकी मम्मी सामने आई,उन्होंने तपाक से अपने बेटे के बारे मेँ पूछा! मैंने डरते डरते जवाब देते हुए कहा कि जो हमारी लापरवाही व होशियारी की कहानी दोहराता रहा ।मुझे जो अनमोल तोहफा मिला वह तुम भी भलीभांति जानते हैं ।मैं पशीने से सराबोर हो गया था और वहाँ से निकल अपने घर की ओर चला गया ।जैसे ही घर पहुंचा,घर का दरवाज़ा मेरी मां ने खोला और बोली इतनी देर तक कहाँ थे ।मैं डरते-डरते उन्हें भी सही बात बता दी ।उसके आगे क्या हुआ होगा,आप भली-भाँति समझ सकते हो ।दूसरे दिन मेरे दोस्त के पिताजी वारासिवनी गये और उसे बस में बिठाकर और सायकिल को बस में लदवाई व अपने शहर पहुँच गए ।इस संस्मरण को मैं पूरी तरह से सच घटना को आपके सामने लाने का प्रयास किया है ।शायद हमारी एक छोटी सी बात व भूल आज तक हम दोनों (दोस्त) भूला नहीं पायें हैं और उस से जीवन को सबक मिला कि कभी भी बिना बतायें/सूचना के घर से बाहर निकलने की कोशिश नहीं करना चाहिए ।कभी भी यारी-दोस्ती में कोई अचानक फैसला नहीं लेना चाहिए ।
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**मौलिक--प्रस्तुति--
*एच-एस-अरमो,अरमान ।रायपुर ।
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