संबलपुर, जिला कांकेर
(छ.ग.)
शीर्षक- *अंधविश्वासों को दूर भगाएं*
हम पढ़े-लिखे
सभ्य समाज कहलाते,
मगर स्वंय को
अंधविश्वासों से जकड़े पाते।
तन-मन से जिंदा है
मगर विचारों से,
स्वंय को रूढ़िवादी
रिवाजों से भरमा जाते।
बड़ी-बड़ी डिग्रियों
का परचम फहराते,
छुआछूत,
बिल्ली का रास्ता काटना,
प्रेतबाधा से बन्धें नजर आते।
ज्ञान- दीपक को
मन अन्तस् में जलाएं,
अंतर्मन का अब
हम तिमिर हटाएं।
तर्कों के आधार पर देखे
दलित कोई न कहाएं,
हाड़-मांस के सब बने तो
दुराव कहाँ से आएं।
आओ भेदभाव से
रहित सभ्य समाज बनाएं
अंधविश्वासों को दूर कर
नवभारत बनाएं।
व्याख्या :- प्रस्तुत कविता में पढ़ लिखकर
भी हम अंधविश्वासों से जकड़े हुए है।
उसको दूर कर नए भारत का निर्माण
करने की बात कर रहे है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर (छ.ग.)
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