स्थान-बनाई तमनार, रायगढ़
विधा- छंदमुक्त कविता
शीर्षक -"अंधविश्वास "
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बिल्ली जब
रस्ता काटे
दाई आंख
है फड़के
तू डर
जाता क्यूँ
ये बात हजम
ना होए
अंग फड़के
छिपकली गिरे
जब उसको
प्यास लगे
सर्दी जब हो
दवा खिलाओ
छींक आना
स्वाभाविक होए
तुम ही तो
कहते हो
बिना मर्जी
ऊपर वाले के
पत्ता तक
ना हिले
फिर क्यों
न विश्वास
ऊपरवाले पर
तुझे होए
फितरत अब तो
बदल लो
टोनेे -टोटके के
झाड़-फूंक
बेकार है
चढ़ा बलि
का बकरा
कर्म तुम्हारा
अनुचित होए
गर मिल जाता
सब कुछ इससे
तो गुनियाई का
गूंजता बोलबाला
सोच को थोड़ा
बदलो तुम
नासमझी
क्यूँ होए
सुधार करो
गर तुम
बिगड़े हो
जब तू
होए मुक्त
अंधविश्वास से
तभी तो
मुक्त जमाना
होए
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