पता - पेंडरवानी, बालोद , छ. ग.
शीर्षक - बाहर हरियाली पर दिल खाली
विधा - कविता (मुक्त छंद )
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बाहर हरियाली पर दिल खाली
आज हरेली त्यौहार है ,
सावन की मस्त बयार है ,
चारों ओर हरियाली है ,
फिर भी मेरा मन खाली है ,
चिड़ियां चहक रही पेड़ों पर,
महक रही बगिया सारी ,
मेरी चिड़िया , मुझे छोड़ चली है ,
किसी के मद की हो सवारी ,
मन झुरमुट में घिर पड़ा है ,
फिर आत्म रक्षा को क्यो अड़ा है?
मिलन के अवसर में बिछड़े हैं ,
अपनों को नित -नित तड़पे हैं ,
मान नही , सम्मान नही ,
झूठा कोई अभिमान नही ,
पग -पग ठेंस लगा दिल को ,
पर कैसे ? कहूं स्वाभिमान नही,
बाहर प्रकृति की अठखेलियां है,
भीतर जलती समाधि है ,
पूरा दिखता तन मेरा ,
मन से उतना ही आधी है ,
खाली - खाली घर मेरा है ,
कोने पर पड़ा खिलौना है ,
चहकते घर आंगन मेरा ,
अब सुना पड़ा बिछौना है ,
सब कुछ होकर कुछ नही ,
बेवजह कलंक जो काली है,
भीतर घुप्प अंधेरा मेरा ,
बाहर देखो हरियाली है ,
आँखे नही रोती तो क्या ?
अंतस तो हरपल रोता है ,
उनके होने की आहट-भ्रम में ,
सुख - चैन जो खोता है ,
जुबां की कड़वी बोली से ,
रिश्ते ,नाची बजे जग में ताली है ,
भीतर घुप्प अंधेरा मेरा ,
बाहर देखो हरियाली है ,
- - शैलेन्द्र चेलक - -
पेंडरवानी ,बालोद ,छत्तीसगढ़
Very nice sir jii
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ReplyDeleteU r such a great person sir jii
ReplyDeleteKya bat h suhane mosam m दिलजले 👏👏
ReplyDeleteअत्यंत सुंदर
ReplyDeleteबहुत ही सुंदर चेलक सर जी
ReplyDeleteBahut achha sir ji
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