Monday, July 20, 2020

बलौदाबाजार से संतराम कुम्हार की रचना- हरेली

रचनाकार -  संतराम कुम्हार 
   जिला -  बलौदाबाजार (छ. ग.) 
   शीर्षक  -  " हरेली तिहार "
     विधा - छंदमुक्त  
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बेटा! आगे हमर पहली तिहार, 
जल्दी उठ, मत कर तैं कछु विचार। 
बाप पुरखा ल चलत आवत हमर तिहार हे। 
अपन संस्कृति ल चलाना तो हमर अधिकार हे।। 

होगे बियासी नाँगर ढिलागे। 
सुरताय के समय, घलो आगे।। 
नाँगर गैंती अऊ निकाल तैं कुदारी। 
रांपा, टंगिया संग नाँगर धोबो, 
बाप-बेटा पारी-पारी।। 
बंसुला साबर ल भी नहलाना हे। 
आज हरेली तिहार मनाना हे।।  

गुरहा चीला, बरा, सोंहारी
अऊ आनी बानी के बनाबो पकवान। 
पूजा करबो नाँगर बइला के, 
वही हे हमर असली भगवान।। 
मुरुम म सब्बो अवजार ल मढ़ाबो। 
हूम धूप देके चीला रोटी ल चढ़ाबो।। 
फूल दूबी ल भी चढ़ाना हे। 
हरेली तिहार हमन ल मनाना हे।।

बाँस के तोर बर गेंड़ी गढ़बो। 
जादा ऊँच्चा नइ बस, मांढ़ी तक करबो।। 
रच-रच कर हमन गेंड़ी बजाबो। 
संगी संगवारी ल घलो नचाबो।। 
लीम पान ल भी बाँद दिस राऊत फलाना हे। 
हरेली तिहार हमन ल मनाना हे।। 

हरेली के संग हरियाली लाय बर 
हमन किरिया खाबो। 
धरती दाई के कोरा म,
आनी बानी के रूख ल जगाबो।। 
रूख ल जगाके बेटा कस ओला बढ़ाना हे। 
हरेली तिहार हमन ल मनाना हे।। 

पेड़ ही हमर जीवनदाता,
भावी पीढ़ी के कर्णधार हे। 
मत काटव ये हरियर डोंगरी ल, 
ये ही तो जीवन के आधार हे।। 
पेड़-पौधा ल हमन ल बचाना हे। 
हरेली तिहार हमन ल मनाना हे।।
 
नाँगर तिहार के सब्बो भाई बहिनी ल हार्दिक हार्दिक शुभकामना हे।।  
                                                                                              
     
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1 comment:

  1. बहुत अच्छा कविता हे संगवारी....

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