जिला - बलौदाबाजार (छ. ग.)
शीर्षक - " हरेली तिहार "
विधा - छंदमुक्त
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बेटा! आगे हमर पहली तिहार,
जल्दी उठ, मत कर तैं कछु विचार।
बाप पुरखा ल चलत आवत हमर तिहार हे।
अपन संस्कृति ल चलाना तो हमर अधिकार हे।।
होगे बियासी नाँगर ढिलागे।
सुरताय के समय, घलो आगे।।
नाँगर गैंती अऊ निकाल तैं कुदारी।
रांपा, टंगिया संग नाँगर धोबो,
बाप-बेटा पारी-पारी।।
बंसुला साबर ल भी नहलाना हे।
आज हरेली तिहार मनाना हे।।
गुरहा चीला, बरा, सोंहारी
अऊ आनी बानी के बनाबो पकवान।
पूजा करबो नाँगर बइला के,
वही हे हमर असली भगवान।।
मुरुम म सब्बो अवजार ल मढ़ाबो।
हूम धूप देके चीला रोटी ल चढ़ाबो।।
फूल दूबी ल भी चढ़ाना हे।
हरेली तिहार हमन ल मनाना हे।।
बाँस के तोर बर गेंड़ी गढ़बो।
जादा ऊँच्चा नइ बस, मांढ़ी तक करबो।।
रच-रच कर हमन गेंड़ी बजाबो।
संगी संगवारी ल घलो नचाबो।।
लीम पान ल भी बाँद दिस राऊत फलाना हे।
हरेली तिहार हमन ल मनाना हे।।
हरेली के संग हरियाली लाय बर
हमन किरिया खाबो।
धरती दाई के कोरा म,
आनी बानी के रूख ल जगाबो।।
रूख ल जगाके बेटा कस ओला बढ़ाना हे।
हरेली तिहार हमन ल मनाना हे।।
पेड़ ही हमर जीवनदाता,
भावी पीढ़ी के कर्णधार हे।
मत काटव ये हरियर डोंगरी ल,
ये ही तो जीवन के आधार हे।।
पेड़-पौधा ल हमन ल बचाना हे।
हरेली तिहार हमन ल मनाना हे।।
नाँगर तिहार के सब्बो भाई बहिनी ल हार्दिक हार्दिक शुभकामना हे।।
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बहुत अच्छा कविता हे संगवारी....
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