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रचनाकार-एच-एस-अरमो ,अरमान ।
निवास-रायपुर ,छत्तीसगढ़ ।
जिला-रायपुर ।
शीर्षक-""पर्यावरण एवं हरियाली पर्व""
विधा -आलेख/लेख ।
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●○पर्यावरण एवं हरियाली पर्व○●
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मैं आपके समक्ष पर्यावरण का आशय रखना चाहता हूँ कि प्रकृति के चारों ओर आच्छादित वातावरण से है ।जिसमें पर्यावरणीय समस्त तत्वों को शामिल किया जाना जरूरी है ।जिसमें प्रमुखतः थल,जल ,नभ और जीव-जन्तु व वनस्पतियाँ हैं ।आज प्रकृति से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रचुरता से किया जा रहा है ।इन सबका प्रभाव मानव जाति के जीवन में और प्रकृति के समस्त जीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है ।इससे सभी का सामान्य जीवन शैली अत्यधिक प्रभावित हुई है ।जिसके कारण जल,ध्वनि प्रदूषण के अलावा औद्योगिक व वायु प्रदूषण को बढ़ावा मिला है ।जिसके कारण मानव जाति के लिए भयानक खतरा पैदा हो गया है और अनेक प्रकार की बीमारियों का संक्रमण बढ़ गया है ।पशु-पक्षियों के भी जीवन शैली में भी अपने विनाशकारी प्रभाव का असर छोड़ रहा है,जिससे उन्हें भी ठीक से भोजन-पानी भी नहीं मिल पाता है और तो वे अनेक बिमारियों से ग्रसित होकर सम्पर्क में आने वाले जीवों को भी बुरी तरह से प्रभावित कर रहे हैं ।वन्यजीवों,पक्षियों को अपने पर्यावास की भी गंभीर समस्या उत्पन्न होने लगी है ।जिसके कारण बहुत से जीवों व पक्षियों की प्रजातियाँ लुप्त के कगार पर हैं ।कभी-कभार जंगली जानवरों का मानव बसाहट की ओर घुसपैठ करने की कोशिश करते रहते हैं और भोजन के लिए फसलों को भी नष्ट कर देते हैं ।पेड़-पौधों की अँधा-धुँध कटाई व दोहन करने के कारण सही ढंग से प्राण वायु भी नहीं मिल पाती है और तो ठीक से वर्षा ही हो पाती है ।जिसके कारण आकाल व महामारी जैसी आफत आ जाती है ।जनसँख्या वृद्धि भी पर्यावरण को बदलने के लिए एक बड़ा कारक सिद्घ हुईं है ।अनेक अनुसंधानों,शोध व खोजों से भी काफी हद तक पर्यावरण प्रदूषण बढ़ा है ।अपितु मानव जाति अपनी नित नई तकनीकों की कोशिश व आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निरंतर प्रयास करते रहता और इसका परिणाम अन्ततः पर्यावरण को प्रदूषित करता ही है ।वैसे आज पर्यावरण की जानकारी व इसके प्रदूषण के प्रभाव को भलीभांति जानते हैं किन्तु मानव ने अपनी आवश्यकता इतनी बढ़ा ली है कि प्रकृति को कुछ न कुछ क्षति तो पहुँचना स्वाभाविक है ।हम-सभी को यह जान लेना होगा की प्रकृति में यदि शुद्ध पर्यावरण नहीं रहेगा तो आने वाले समय में हम सबका जीवन बुरी तरह से प्रभावित होकर ही रहेगा ।इसलिए विश्व स्तर पर पर्यावरण के प्रदूषण को रोकने के उपाय व निदान हेतु अनेक प्रकार के यंत्रों की खोज,उपयोग के साथ सावधानियाँ भी अपनाई जा रही है ।सरकारी स्तर पर भी इस हेतु कानून-व्यवस्था बनी है और इसके अनुपालन न करने पर दण्ड का विधान है ।इसकी रोकथाम के लिए भी विश्व स्तर पर भी कठोर कानून-व्यवस्था व विधान बनाये गये हैं ।समय समय पर कई देशों के इस मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हुए बैठकों का आयोजन किया जाता रहा है और इस समस्या से निपटने के लिए कारगर कदम उठाने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर फैसला भी लिया जाता रहा है ।वैसे राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण की नीति अपनाई जा रही है सरकारी और जनमानस की ओर से भी,प्रति वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण दिवस व भारत में वन महोत्सव दिवस जैसे कार्यक्रम बनाये गये हैं ।शैक्षणिक संस्थानों में भी विद्यार्थियों को भी इसके प्रति जागरूकता पैदा करने की कोशिश की जाती है और एन एस एस जैसी ईकाई की स्थापना की गई है ।शासन द्वारा भी कुछ विभागों का निर्माण किया गया है ।जैसे-कृषि ,वन व उद्यानिकी विभाग आदि ।
भारत देश बहुत भाग्यशाली राष्ट्र है ।यहाँ प्रकृति ने मुख्य रूप से तीन मौसम प्रदान किया है ।जिसमें वर्षा ऋतु सबसे ज्यादा प्रभावकारी माना जाता है ,चूँकि हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है ।जिस हेतु वर्षा ऋतु का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है ।देश की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का बहुत बड़ा योगदान है ।वर्षा ऋतु में प्रकृति में चारों ओर हरियाली और मनोरम दृश्य दिखाई देता है ।सारे जीव-जन्तुओं में खुशीहाली छा जाती है और अनेक हितकारी व अहितकर जीव-जन्तुओं का नवसृजन भी होता है ।इस मौसम में किसानों के लिए कई पर्व व त्योहार आते हैं जिनमें हरियाली ,अखाड़ी,रक्षा बंधन,कृष्ण जन्माष्टमी,गणेश चतुर्थी आदि हैं ।किन्तु किसानों के लिए हरियाली पर्व का अत्यधिक महत्व है ।इस पर्व में किसान भाई अपने खेती कार्य में उपयोग आने वाले औजारों व सामानों की विधि-विधान से पूजा करते हैं और खुशी से झूमते,गाते और नाचते-गाते हैं व पकवानों का भी रसास्वादन भी करते हैं ।इसके अलावा पोला-बैलों की पूजन ,बच्चों के लिए मिट्टी के नदींया-बैल (लकड़ी)की पूजा व दक्षिणा भी दी जाती है और लोहार दरवाजों में किल में सगुन के तौर ठोकता है ।गेड़ी खेलना व उसका विसर्जन,महिलाओं के लिए तीज का त्यौहार अपार हर्ष से मायके में आकर मनाना जरूरी होता है ।जंगली औषधीय पौधों व उनको जंगल से हरियाली पर्व के दिन लाना शुभ माना जाता है ।
अतः हम सब जानते हैं कि पर्यावरण एवं हरियाली पर्व पूरे छत्तीसगढ़ के लिए कितना महत्व रखता है और धान का कटोरा कहलाता है ।यहाँ वन क्षेत्र भी बहुत है ।खनिजों की भरमार उपलब्धता होने के कारण इससे संबंधित उद्योग भी हैं ।जिनमें लोगों को रोजगार के अवसर भी मिले हैं और नुकसान के रूप में पर्यावरण प्रदूषण भी बढ़ा है ।हमें एक बात जान लेनी चाहिए कि एक सिक्के के दो पहलू होते हैं,एक ओर लाभ है तो एक ओर नुकसान भी हुआ है ।कुल मिलाकर यह कहना चाहता हूँ कि पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान केंद्रित करते हुए ,छत्तीसगढ़ राज्य के इस मौसम में आने वाले तीज-त्यौहारों को भी उतना ही महत्व देना होगा ।अपितु इस समय कोरोना वायरस के संक्रमण से सभी को मानसिक पीड़ा ,शारीरिक व आर्थिक परेशानी से झूझ रहा है फिर भी हर हाल में जैसे-तैसे पर्व का आनंद उठायेंगे ।
सभी साथियों से विनम्र अनुरोध है कि पर्यावरण संरक्षण में अपना व्यक्तिगत योगदान दें व वृक्षारोपण आवश्यकता अनुसार अवश्य करें एवं हरियाली पर्व का आनंद उठायें,साथ ही निर्धन जनों की यथा-शक्ति सहयोग भी करने का प्रयास करें ।
शुभेच्छाओं के साथ----
आपका साथी,
एच-एस- अरमो'अरमान
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