Saturday, July 11, 2020

रायगढ़ से गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" की रचना- यायावर

रचनाकार-गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न"
जिला-रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
विधा-छंद मुक्त
विषय-मानव का ऐतिहासिक विकास
शीर्षक- *यायावर*
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          "यायावर"
मनु संहिता का व्याख्यान यायावर,
राम-कृष्ण-गीता का ज्ञान यायावर ।
खुद ही खुद में कैसा रोया रे इंसान,
था तू महावीर-बुद्ध का सहज ध्यान यायावर ।।

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मानवता का विध्वंस यायावर,
अनर्थ-अन्याय का वो दंश यायावर ।
प्रज्वलित शिखा सदा तम हरे,
चाक-आग का उत्पादक मानस-हंस यायावर ।।

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आधुनिकता का आश्चर्य यायावर,
वल्लभ-वनिता का साहचर्य यायावर ।
सत्य संभाले फिरे कमण्डल में,
दनुज-दानवों में असुराचार्य यायावर ।।

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तपन जलन जग में आमीन यायावर,
पुष्पगंधा-पुष्परज यासमीन यायावर ।
तुच्छ रुक्ष गात का संरक्षण कैसा,
सरल तरल में ग्लिसरीन यायावर ।।

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अंधकार-अनंत एक अज्ञात यायावर,
अदम्य-आदित्य का सुप्रभात यायावर ।
नैन-निर्मल-निर्झरिणी,
शुद्ध सोता-सुख प्रपात यायावर ।।

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मनुष्यता का मर्म यायावर,
सद्भावना-सहृदयता सा धर्म यायावर ।
प्रेस्वेद नीर-नित प्रवाह हो,
सत्य-असत्य मध्य कोई सत्कर्म यायावर ।।

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दर्प-दंभ का इतिहास यायावर,
मानव में मानव का आभास यायावर ।
वन-वन भटकता सत्य-सत्कार यहॉं,
राम को चौदह वर्ष का वनवास यायावर ।।

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गुलशन खम्हारी "प्रद्युम्न" 

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