जिला -रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )
विधा -गीत
शीर्षक- "जनम-जनम की प्यासी"
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🌷जनम जनम की प्यासी🌷
मैं जनम जनम की प्यासी।
मैं प्यास बुझाने आई हूंँ।
मेरी प्यास कहीं बुझ जाए।
मैं दरिया ढूँढने आई हूँ।
दरिया तो मुझे मिली है।
लेकिन पी नहीं पा रही हूंँ।
मदहोश की इस दुनियाँ में।
मैं खुद का होश गवाँई हूंँ।
यह कैसे रिश्ते नाते हैं।
यह कैसी भ्रमित संसार है।
जहां भी नजरें उठा के देखो।
मनोरंजन का संसार है।
मैं मझधार में फँसी हूंँ।
किनारा मुझको ढुँढना है।
मेरी नैया कहीं ना डूब जाए।
अब मुझे सहारा ढूंँढना है।
मेरा लक्ष्य मुझे पता है।
अब लक्ष्य को मुझे पाना है।
औरों को भी लक्ष्य मिल जाए।
मुझे ऐसी योजना बनाना है।
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व्याख्या- इस गीत में गीतकार अपनी भावनाओं को व्यक्त किया है ,कि इस संसार में हर मनुष्य की आत्मा ज्ञान रूपी प्यासी है। इसी प्यास को बुझाने के लिए अर्थात ज्ञान को पाने के लिए इस संसार में आता है ।उसे अनुभव संपन्न ज्ञानी व्यक्ति मिल तो गए हैं। लेकिन उन्हें अनुभव नहीं हो पा रहा है क्योंकि यह चकाचौंध की दुनियाँ उन्हें मदहोश कर दे रही है। इसलिए वह ज्ञान प्राप्त नहीं कर पा रही है ।यह संसार भ्रमित है। यहां जो भी रिश्ते नाते हैं भौतिक चकाचौंध के रिश्ते हैं। यहां भी गीतकार देखती हैं, तो उसे मनोरंजन की दुनियाँ दिखाई देती है ।और इसी मझधार में वह फंसी हैं इस मझधार से वह मुक्ति पाना चाहती हैं और अपने रास्ते का किनारा ढूंढने चाहती हैं। वो कहती है ।मेरा शरीर इस भवसागर से कहीं जल्दी बिदा न
हो जाए, तब तक वह अपने लक्ष्य को पाना चाहती है और औरों को भी लक्ष्य मिल जाए, इसके लिए योजना बनाना चाहती है ।मानव का लक्ष्य है ज्ञान , ज्ञान को पाना अर्थात ईश्वर को पाना चाहती हैं।
ईश्वर ही हर मानव के शरीर में ज्ञान स्वरूप में विद्यमान है और यही आनंद है। इस आनंद रुपी ज्ञान को गीतकार पाना चाहती हैं।
उर्मिला सिदार
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