जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
भाव :- निर्वेद
शीर्षक :- सावन
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ओ घटा घनेरी घुमड़ - घुमड़,
पवन पुरवाईया साथ लिए।
ला रही नव उल्लास उर में,
मोतियों की बरसात लिए।
बरखा बरस कर धरा में,
तृण - तृण भिगोने आई है।
तपती धरा थी कब से प्यासी,
प्यास बुझाने आई है।
नव आस लिए यह मास है जो,
भरे भक्ती भाव से सावन।
हर हृदय झंकृत करती,
आई देखो पावस पावन।
व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने सावन के महीने के आने की बात को बहुत ही सुन्दर तरीके से प्रकट करने का प्रयास किया है।
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