संबलपुर, कांकेर, (छ .ग.)
विषय- निर्वेद भाव से संबंधित
शीर्षक-क्षण भंगूर जीवन
विधा-मुक्त छंद
*क्षणभंगूर जीवन*
हे नटवर नागर मेरी पीड़ा हरो,
भवसागर में पड़ी नैया पार करो।
विरह वेदना में डूबा मेरा मन,
अपने मधुर सुस्मित हास भरो।
पतझड़ सा बन गया जीवन मेरा,
बसन्त बयार बन हर्षित कर दो।
अमावस की काली रातों ने घेरा,
तुम बन पूनम प्रकाश से भर दो।
अपने चरण -कमलों में शरण दो,
जीवन भर रत रहूँ ऐसा मति कर दो।
माया-मोह,तृष्णा ने नाच नचाया,
मैं मोक्ष पथ पर चलूं ऐसी युक्ति भर दो।
पानी का बुलबुला है क्षणभंगूर जीवन,
आवागमन भरा जीवन से मुक्त कर दो।
व्याख्या:- उपरोक्त कविता में मनुष्य के क्षणभंगुर अर्थात नष्ट होने वाले जीवन के बारे में बताया गया है।ईश्वर के शरण मे पहुँच कर मोक्ष पाना चाहता है।
नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर(,छ .ग.)
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