जिला :- महासमुंद
विधा :- छंद मुक्त कविता
शीर्षक :- न आता कोरोना, न बेगारी आती।
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जाने क्यों तू आई जीवन में,
बिन बुलाए मेहमान की तरह।
मचाई है तहलका जीवन में,
नरभक्षी शैतान की तरह।
न जा सकते हैं बाहर,
ना घर की चारदीवारी सुहाती।
न आता कोरोना, न बेगारी आती।
न आता कोरोना, न बेगारी आती।
जाने कितने दिन हुए नहीं गए,
और जाने कितने ही दिन काम पर नहीं जाएंगे।
फिर कैसे लाएंगे आटा घर को,
भला कैसे चूल्हा जलाएंगे।
जाएं कहां, कैसे पगार को,
हर दर से खाली हाथ दुत्कारी जाती।
न आता कोरोना, न बेगारी आती।
न आता कोरोना, न बेगारी आती।
माना बंद पड़े हैं काम - काज,
लेकिन क्या बंद हो सकती है भूख-प्यास।
बंद हो गए हैं ओ रास्ते भी,
जहां से बरसों की थी आस।
ना गलती करता मनुज,
ना ही यह महामारी आती।
न आता कोरोना, न बेगारी आती।
न आता कोरोना, न बेगारी आती।
बच्चे मांगे कपड़े - खिलौने,
घरवाली चाहे राशन - पानी।
उधार पर उधार होते दुकानदार की,
अब देने को करता आना - कानी।
अब तो बस सोचता हूं मैं दुखियारा,
काम मिलता तो न लाचारी आती।
न आता कोरोना, न बेगारी आती।
न आता कोरोना, न बेगारी आती।
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व्याख्या :- उपरोक्त पंक्तियों में रचनाकार ने एक कामकाजी व्यक्ति की व्यथा को प्रकट करने का प्रयास किया है। जिसमें लाचार व्यक्ति कोरोनाकाल में बेरोजगार होने के बाद यह कह रहा है कि - " न ये कोरोना आता, और ना ही उसे बेरोजगार होना पड़ता।
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