ग्राम - बुलाकी
जिला - रायगढ़ छत्तीसगढ़
विधा - कविता
शीर्षक - संस्कार
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**संस्कार**
समझ से समाधान मिले,
श्रम से मिले समृद्धि।
विश्वास से अभय मिले,
यही है समाज की संस्कृति।
दीनता, हीनता ,क्रूरता त्याग,
बने धीरता ,वीरता ,उदार।
मानवीयता से मानत्व बने,
ऐसा बने जन संस्कार।
प्रिय,हित ,लाभ नियंत्रण कर,
न्याय, धर्म ,सत्य अपनाइए।
भय ,आस्था, प्रलोभन, त्याग कर,
ऐसा संस्कार बनाइये।
उपकार कर उपकारी बने,
स्वार्थ त्याग बने परमार्थी,
धर्म कर धर्मात्मा बने,
यही है मानव की सन्मार्गी।
ऐसी संस्कार बनाइए जग में,
हो जन- जन का उद्धार।
वसुंधरा स्वर्ग बन जाए,
जले ज्योति द्वार- द्वार।
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व्याख्या -- इस कविता में कवित्री मानव को संस्कार पूत होने की संदेश को व्यक्त की है। मनुष्य समझकर ही जीने से समाधान पाता है और श्रम से ही घर में भौतिक वस्तुओं की समृद्धि निरंतर बना रहता है। विश्वास के साथ जीने से ही ही मानव समाज में अभय के साथ जी पाएगा, यही समाज की संस्कृति है। ऐसी संस्कृति से ही मानव संस्कार पूत होता है। अवगुण त्याग, सद्गुणों को अपना कर ही मनुष्य संस्कारिक होता है।
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उर्मिला सिदार
रायगढ़ (छग)
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