संबलपुर, जिला -कांकेर
शीर्षक-पर्रा भर लाई
*पर्रा भर लाई*
अवनि और अंबर
की होती बहुत बढ़ाई,
सौन्दर्य को लेकर
दोनों में हुई लड़ाई।
दोनों के सौन्दर्य की
उपमा कहि ना जाई,
आसमाँ में तारे फैले
जैसे पर्रा भर लाई।
धरा की शोभा भी
किसी से बरनी न जाई,
गगन और धरा के
बीच रोज होती पहुनाई।
धरा महारानी भी
खूब इतराई,
अद्भुत चमक लिए
मोती जैसे पर्रा भर लाई।
सूरज -चन्दा आते
करते जी भर रोशनाई,
गम-गम गमके,
महक उठी अमराई।
जीवन में बहती रहे
सदा खुशियों की पुरवाई।
सौन्दर्य का मानक बन
व्योम में फैली पर्रा भर लाई।
अवनि और अंबर
की होती बहुत बढ़ाई,
सौन्दर्य को लेकर
दोनों में हुई लड़ाई।
*व्याख्या*-उपरोक्त कविता में धरती और आकाश के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है।आकाश में बिखरे तारों को "पर्रा भर लाई "की उपमा दी गई है,अर्थात आसमान रूपी पर्रा में सितारे रूपी तारे फैले हुए है।
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नलिनी बाजपेयी
संबलपुर,कांकेर(,छ .ग.)
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