जिला-कांकेर,छग
शीर्षक-जीवन -दर्शन
विधा-कविता ( मुक्त छंद)
जीवन, जन्म और
मृत्यु के बीच की
कड़ी है।
इन्हीं उलझनों में
उलझी ये कैसी
लड़ी है।
बड़ी चालाक है
ये जिंदगी
नई सुबह दे
हमारा आज
छीनती जाती है।
चैन,सुख और
समृद्धि की
चाह में उम्र
बीत जाती है।
जीवन है तो
आस है ,
ग्रीष्म में
बरसात का
पतझड़ में
बसंत का
कि फिर आयेगा
सावन बिछड़े हुए
आत्मीय जनों से
पुनर्मिलन होगा।
किंतु संवेदनाओं का
झरोखा हर पल
खोजता है
मासूम बचपन
और खूबसूरत
यौवन।
तभी सिसक पड़ता है
बूढ़ा तन जिसके
मस्तिष्क में कैद हैं
अतीत की तमाम
खुशियां, झोली भर
सपने व धुंधली यादें।
और तभी मौत
आती है
चुपके-चुपके
पलभर में
मना ले जाती है
रुह को
हमेशा -हमेशा
के लिए।
यही है जन्म और
मृत्यु के बीच की
यात्रा और
जीवन -दर्शन।
मीरा आर्ची चौहान
कांकेर, छग
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