कवयित्री :डॉ पंकजवासिनी
पता:शुभम् समृद्धि कॅम्प्लेक्स
बेली रोड, पटना, बिहार
कविता का शीर्षक - "करगिल विजय दिवस" स्मृति
याद है मुझे
जब देश की सीमा में
चुपचाप चोरों सा घुसकर...
दीमक सा फैलकर
भारत माता के शुभ्र - श्वेत अंचल पर
कालिमा लगाने का
दुस्साहस करने वाले
शत्रुओं को
नेस्तनाबूत करने के लिए...
राष्ट्र - स्वातंत्र्य की बलिवेदी पर
निज कर्तव्य की हविष डालने...
तुम्हारे माथे पर
विजय तिलक लगाकर
सहास विदा किया था मैंने :
अपने दस माह के दुधमुँहे को गोद लिए!
और साथ खड़े 8 वर्षीय पुत्र संग
हाथ हिला कर कहा था :
"जीतकर लौटना "!!
मैं रखूँगी ख्याल सबका
"तुम बन"!!
तुम हर मोह से मुक्त...
हर उत्तरदायित्व से निश्चिंत...
हर भावनाओं के भँवर से निकल...
बस, राष्ट्र के प्रति एकनिष्ठ हो
अपने दायित्व निभाना...
करगिल पर तिरंगा फहराना!!
मैं मिलूँगी तुम्हें प्रतीक्षा में
तुम्हारी तुतली अमानतों को सँभाले!!
इस बीच देखा मैंने
चुपचाप मूकदर्शक बन :
पिता के गहरे निःश्वासों को...
मुझे छुप कर देखती करुण निगाहों को...
माँ का हर मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे में
मत्था टेकना... चादर चढ़ाना...
मन्नतें माँगना और धागा बाँधना...
दहशत में डूबी बहन की नम आँखें...
भाइयों के रुद्ध कंठ... सहमी दृष्टि...
टीवी पर युद्ध के धुआँधार समाचार!
वीरों को घर लाते कंधे चार!!
दाँत भींच... मुट्ठियां बाँध...
हृदय पर रख पाषाण...
झेले सारे दृश्य विकराल!
पर सुन अबोध के प्रश्न
दो टूक होता सीना...
जब तुम्हें ढूँढती दूधिया आँखें
हिलोर उठती हृदय - वीणा!!
यूँ ही झेले सारे झंझावात...
दो माह बीते :आया स्वर्णिम प्रभात!!
तुम आए थे आज ही के दिन!
मेरी अदम्य आशा का लिए दीप!!
विजयी! हर्षित - प्रफुल्लित!! गर्वित!!!
खुशियाँ घर के कोने कोने गुंजारित!!!
खुशियाँ घर के कोने कोने गुंजारित!!!
डॉ पंकजवासिनी
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, RSS महिला कॉलेज, Sitamadhi
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