कवि- अभय चौरे
पता- हरदा मप्र
शीर्षक- कारगिल
शत्रु ने सीमा में घुसकर जब
फिर से हमको ललकारा था
हुंकार उठी थी रणचंडी जिसने
शत्रु के अरिदल को संहारा था ।।
हर जवाँ में समा गई थी वो
शत्रु दमन को जो जा रहा था
बढ़ चली थी हिंद की सेना भी
लहू में उनके भड़का अंगारा था ।।
बड़ी कठिन थी ये राह मगर
शेर ए हिंद कब भला हारा था
एक एक भारत के शेर ने
हर एक को चुनकर मारा था ।।
चलता रहा युद्ध कई घंटों तक
भारत भी कहां हिम्मत हारा था
अपनी सेना के दल बल से
दिया शत्रु को जवाब करारा था ।।
लहर दिया कारगिल की चोटी पर
भारत का तिरंगा जो प्यारा था
भारत माँ के चरणों में जिसने
अपना तन मन सारा वारा था ।।
है आज का दिन वो विजय दिवस
जब शत्रु का ध्वज हमने उतारा था
भारत की सेना की वीरता देखकर
डोल गया ये संसार सारा था।।
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