नाम -ओमप्रकाश साहू "अंकुर "
पता - सुरगी, छत्तीसगढ़
जिला - राजनांदगांव
विधान - छंदमुक्त (छत्तीसगढ़ी)
अपने डहर कमाबो खाबो
परदेस ले अपन जनम भूमि कोति आवत हे ।
कोरोना हा सब ला अपन माटी मा लावत हे ।।
गजब झन पैदल कतको दूरिहा ले आवत हे ।
रेंगत -रेंगत ओमन अब्बड़ दुख पावत हे ।।
धनवान मन हा जी गजब मजा उड़ावत हे ।
गरीब मनखे मन संसो- फिकर मा मर जावत हे ।।
बस रेलगाड़ी हा इंकर भाग मा नई हे संगी हो ।
देखव गा जानवर जइसे टरक मा भरावत हे ।।
कुछु नई मिलत हे मजदूर मन ला सहयोग ।
लांघन -भूखन वोमन ला रहे ला पड़ जावत हे ।।
दू बीता के पेट खातिर परदेस मा जाके ।
अपन करम ला मरो जियो ले ठठावत हे ।।
आवत खानी वोमन जऊन दुख पाहे तेला ।
सुसक- सुसक के सब ला बतावत हे ।।
सबो मन अपन छइहाँ भुइयाँ डहर आवत हे ।
नई जावन कभू परदेस कहिके कसम खावत हे।।
अपन गांव अपन राज डहर रहिके कमाबो खाबो ।
मजदूर मन हा अइसन अब अपन मन ला बनावत हे ।।
भावार्थ - कोरोना महामारी के कारण सबसे ज्यादा मजदूर प्रभावित हुए हैं. वे अपने एवं अपने परिवार का भरण पोषण हेतु अपने गांव और शहर को छोड़ कर दूसरे राज्य गए हुए थे. इस बीच कोविड -19 के चलते देश भर में लाक डाउन हो गया. मजदूर जहां फंसे थे वहीं फंस गए. ऐसी स्थिति में उनके समक्ष भूख मरने जैसे हालात निर्मित हो गए .
ऐसे स्थिति में मजबूर मजदूर अपने राज्य एवं गांव की ओर पैदल ही लौटने लगे क्योंकि बस, रेलगाड़ी का चलना भी बंद हो गया. फिर मजदूर हजारों किलोमीटर दूर पैदल ही चलने लगे. इस समय बेबश मजदूर बहुत ही तकलीफ पाए. पैदल चलते चलते पांव में छाले पड़ गए. खाने पीने के लिए तरसना पड़ा. इस विकट दौर में जब उनको गंतव्य स्थल तक ले जाने के लिए बस /रेलगाड़ी की सुविधा
उपलब्ध नहीं हो पाई थी तब तक ट्रक में ही जानवर जैसा सफर करना पड़ा. कुल मिलाकर कोरोना महामारी के चलते मजदूर ों की स्थिति बहुत ही बदतर हो गई है. वे अपने जन्म भूमि लौटने लगे और भाव विभोर होकर यह प्रण करने लगे कि अब हम अपने ही गांव /राज्य में रोजी रोटी कमाएंगे और अपने छइहाँ भुईयाँ को छोड़ कर नहीं जाएंगे.
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