जिला----जांजगीर -चाम्पा
राज्य---छत्तीसगढ
विधा---कविता (निर्वेद पर आधारित)
शीर्षक -- तुझसे घृणा है मुझको
व्याख्या -कवि के द्वारा अवगुण से युक्त मनुष्यों की निंदा एवं उन्हें समाप्त करने पर जोर दिया गया है ।
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तूझसे घृणा है मुझको
जिस सागर में जल नहीं ,....उससे मुझको घृणा है ।
जिस सागर में जल अधिक, उससे मुझको पीड़ा है ।
पुष्पों की प्रशंसा सुन,
मन प्रफुल्लित हो उठता ।
जब उसको दिये जाते तोड़,
मेरा मन भी है टूटता ।
ऐसे कृत्य की करु निंदा, चिढ़ा मन मेरा चिढ़ा है ।
मानव में गुणों का लोप,
क्षण क्षण बढ़ाता मेरा कोप ।
हरदम उस जैसे के लिए,
मेरा मन बना रहता तोप ।
जिस जीवन में पलता सदगुण, उसके लिए क्रीड़ा है ।
नफरत करता मैं उनसे,
जो अन्याय की राह पर चलता ।
उसके कारण मेरे मन में ,
असंतोष ही असंतोष पलता ।
ज्यादा होगा उन्हें समाप्त करने का, मेरे पास भी बीड़ा है ।
अशांति जग में फैलाकर,
अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले ।
मेरे दृष्टि में श्वेत नहीं ओ....
,तन मन दोनों से है वो काले ।
मेरे चिंतन के नवयुग पन्ने में, दुत्कारने का द्वन्द छीड़ा है ।
गिरधारी लाल चौहान
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