Thursday, July 9, 2020

रायगढ़ से जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले' की रचना- हरि भजन में डूबे रहना

रचनाकार--जगतसिंह ठाकुर 'बंजारीवाले'
स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'हरि भजन में डूबे रहना'
                     ०×××××××०
मानव जनम  पाके  मूरख , करना छोड़ो  अभिमान ।
पानी  का  बुलबुला  जैसा , मनुज जनम होता जान ।।
पद-प्रतिष्ठा-दौलत  का  तू , अब घमंड  करना छोड़ ।
अभिमान भी करना छोड़ो , अपना  विचार  तू मोड़ ।।
पुत्र  -  पुत्री   जितने    तेरे , नारी   माया   की   डोर ।
तू सठ  प्रपंच  के  जाल में , घिरा  हुआ है  चहुँ ओर ।।
स्वारथ के  सब  रहे साथी , धोखा  करते  सब साथ ।  
तेरे  संकट   के   समय  में , खींच  लेगें   सारे   हाथ ।।
जिन दोस्तों के साथ है  तू , करते   रहा    राज - रंग ।
जाते   समय   कोई    तेरा , नहीं     निभायेंगे    संग ।।
जोड़ता धन तू छल करके , लोगों  से  कपट  तमाम ।
जितने सभी माल-खजाने , माया   के    होते   धाम ।।
महल-अटारी  भी  बनाया , बहुत  सारे घर - मकान ।
घर  में  भर  लिया  है  तूने , सुविधाओं  के   सामान ।।
मोटर - गाड़ी भी   खरीदा , देके   तुम    ऊँचे   दाम ।
वातानुकूलित  कमरों  को , समझ रखा है सुखधाम ।।
बैंक में तू धन जमा किया , कई  लाख  कई  करोड़ ।
अन्त समय में है सभी को , बस  जाना  होगा  छोड़ ।।
अब तो समझ कर ले बंदे , हरि  चरणों  में  दे ध्यान ।
तुम्हारा   भव  बंधन  सारे , तोड़ेंगे   करुणा  निधान ।।
हरि भजन में  डूबे  रहना , यह मानव  तन का  सार ।
पीड़ा किसी को  मत देना , कर  दया- धर्म -उपकार ।।
राम-कृष्ण-हरि नाम गाना , हो  जायेगा   भव   पार ।
इस विश्व से 'ठाकुर'केवल , ईश्वर     हैं     तारणहार ।।
                        ०××××××××०
व्याख्या--प्रस्तुत कविता में मानव जीवन , वैभव एवं
             की नश्वरता के साथ  माया-मोह के बन्धन
             को तोड़ने तथा ईश भजन में लगे रहने का
             सुझाव दिया गया है ।

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