स्थान--सारंगढ़ , जिला--रायगढ़ { छग }
विधा--कविता
शीर्षक--'हरि भजन में डूबे रहना'
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मानव जनम पाके मूरख , करना छोड़ो अभिमान ।
पानी का बुलबुला जैसा , मनुज जनम होता जान ।।
पद-प्रतिष्ठा-दौलत का तू , अब घमंड करना छोड़ ।
अभिमान भी करना छोड़ो , अपना विचार तू मोड़ ।।
पुत्र - पुत्री जितने तेरे , नारी माया की डोर ।
तू सठ प्रपंच के जाल में , घिरा हुआ है चहुँ ओर ।।
स्वारथ के सब रहे साथी , धोखा करते सब साथ ।
तेरे संकट के समय में , खींच लेगें सारे हाथ ।।
जिन दोस्तों के साथ है तू , करते रहा राज - रंग ।
जाते समय कोई तेरा , नहीं निभायेंगे संग ।।
जोड़ता धन तू छल करके , लोगों से कपट तमाम ।
जितने सभी माल-खजाने , माया के होते धाम ।।
महल-अटारी भी बनाया , बहुत सारे घर - मकान ।
घर में भर लिया है तूने , सुविधाओं के सामान ।।
मोटर - गाड़ी भी खरीदा , देके तुम ऊँचे दाम ।
वातानुकूलित कमरों को , समझ रखा है सुखधाम ।।
बैंक में तू धन जमा किया , कई लाख कई करोड़ ।
अन्त समय में है सभी को , बस जाना होगा छोड़ ।।
अब तो समझ कर ले बंदे , हरि चरणों में दे ध्यान ।
तुम्हारा भव बंधन सारे , तोड़ेंगे करुणा निधान ।।
हरि भजन में डूबे रहना , यह मानव तन का सार ।
पीड़ा किसी को मत देना , कर दया- धर्म -उपकार ।।
राम-कृष्ण-हरि नाम गाना , हो जायेगा भव पार ।
इस विश्व से 'ठाकुर'केवल , ईश्वर हैं तारणहार ।।
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व्याख्या--प्रस्तुत कविता में मानव जीवन , वैभव एवं
की नश्वरता के साथ माया-मोह के बन्धन
को तोड़ने तथा ईश भजन में लगे रहने का
सुझाव दिया गया है ।
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